आगरा शानदार चित्रकारी के बीच दीवारों और छतों पर दर्पणों की श्रंखला। कारीगरी ऐसी कि हल्की रोशनी की किरण फूटे तो धीरे- धीरे पूरा कक्ष रोशन हो जाए। हर दर्पण में उसका अक्स नजर आए। यह खासियत आगरा किले में बने उस शीशमहल की है, जो कभी शहंशाह शाहजहां की बेगम मुमताज महल का स्नानागार था। परंतु पर्यटकों की नासमझी ने इसे घाव दिए। मरम्मत हुई तो लेंस न मिले। मुमताज महल की खास दिलचस्पी के चलते मुगलकाल में शीशमहल की दर-ओ-दीवार से लेकर हर दर्पण तक जीवंत रहता था। 17 जून 1631 को मुमताज महल की मौत के बाद इसकी अद्धितीय आभा मद्धिम पड़ती गई। शुक्रवार को मुमताज की मौत को 380 साल पूरे हो जाएंगे, परंतु शीशमहल आज भी अपनी खोयी आभा वापस पाने को तरस रहा है। इसके बाहरी और भीतरी हिस्से की मुख्य कारीगरी, इनमें लगे दर्पण हैं। पर्यटकों की नासमझी से इसकी यह खासियत अब पहले जैसी नहीं रही। पूर्व में सैलानी यहां लगे शीशों को उखाड़ कर ले जाते थे। इससे ज्यादातर दर्पण खराब होकर गिर गए। हालांकि एएसआइ ने वर्षो पहले शीशमहल में पर्यटकों का प्रवेश बंद कर दिया। फिर करीब 21 साल पहले इसका सरंक्षण करा बाहरी हॉल में नये दर्पण लगवाए। किन्तु, भीतरी कक्ष के सरंक्षण की कोशिश नहीं हुई। सूत्रों के मुताबिक शीशमहल के संरक्षण के लिए उत्तल और अवतल दोनों ही प्रकार के दर्पणों की जरूरत है। तब कोशिश के बाद भी अवतल लैंस उपलब्ध नहीं हुए। इसी बीच कुछ अफसरों ने सरंक्षण कार्य से कक्ष का मूल स्वरूप खत्म होने का डर जताया, इससे काम को रोक दिया गया। तब से अब तक इसके लिए कोई कोशिश नहीं हुई। एएसआइ के अधीक्षण पुरातत्वविद आइडी द्विवेदी ने बताया कि शीशमहल के संरक्षण का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं। हालांकि संरक्षण में किसी चीज की अनुपलब्धता जैसा कोई कारण नहीं। जब प्रस्ताव तैयार होगा तो संरक्षण कराया जाएगा.
Wednesday, June 29, 2011
लेंस मिलते तो निखर जाता शीशमहल
आगरा शानदार चित्रकारी के बीच दीवारों और छतों पर दर्पणों की श्रंखला। कारीगरी ऐसी कि हल्की रोशनी की किरण फूटे तो धीरे- धीरे पूरा कक्ष रोशन हो जाए। हर दर्पण में उसका अक्स नजर आए। यह खासियत आगरा किले में बने उस शीशमहल की है, जो कभी शहंशाह शाहजहां की बेगम मुमताज महल का स्नानागार था। परंतु पर्यटकों की नासमझी ने इसे घाव दिए। मरम्मत हुई तो लेंस न मिले। मुमताज महल की खास दिलचस्पी के चलते मुगलकाल में शीशमहल की दर-ओ-दीवार से लेकर हर दर्पण तक जीवंत रहता था। 17 जून 1631 को मुमताज महल की मौत के बाद इसकी अद्धितीय आभा मद्धिम पड़ती गई। शुक्रवार को मुमताज की मौत को 380 साल पूरे हो जाएंगे, परंतु शीशमहल आज भी अपनी खोयी आभा वापस पाने को तरस रहा है। इसके बाहरी और भीतरी हिस्से की मुख्य कारीगरी, इनमें लगे दर्पण हैं। पर्यटकों की नासमझी से इसकी यह खासियत अब पहले जैसी नहीं रही। पूर्व में सैलानी यहां लगे शीशों को उखाड़ कर ले जाते थे। इससे ज्यादातर दर्पण खराब होकर गिर गए। हालांकि एएसआइ ने वर्षो पहले शीशमहल में पर्यटकों का प्रवेश बंद कर दिया। फिर करीब 21 साल पहले इसका सरंक्षण करा बाहरी हॉल में नये दर्पण लगवाए। किन्तु, भीतरी कक्ष के सरंक्षण की कोशिश नहीं हुई। सूत्रों के मुताबिक शीशमहल के संरक्षण के लिए उत्तल और अवतल दोनों ही प्रकार के दर्पणों की जरूरत है। तब कोशिश के बाद भी अवतल लैंस उपलब्ध नहीं हुए। इसी बीच कुछ अफसरों ने सरंक्षण कार्य से कक्ष का मूल स्वरूप खत्म होने का डर जताया, इससे काम को रोक दिया गया। तब से अब तक इसके लिए कोई कोशिश नहीं हुई। एएसआइ के अधीक्षण पुरातत्वविद आइडी द्विवेदी ने बताया कि शीशमहल के संरक्षण का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं। हालांकि संरक्षण में किसी चीज की अनुपलब्धता जैसा कोई कारण नहीं। जब प्रस्ताव तैयार होगा तो संरक्षण कराया जाएगा.
Subscribe to:
Comments (Atom)