Sunday, February 20, 2011

‘ओथेलो ’ की ब्रजमयी प्रस्तुति


शेक्सपीयर का मशहूर नाटक ओथेलोविश्वास-अविश्वास के मनोभावों की टकराहट का नाटक है। ओथेलो डेसडेमोना से प्रेम करता है, उससे विवाह करता है लेकिन शक की वजह से उसको मार भी देता है। यों तो इस नाटक की भारत में कई प्रस्तुतियां हो चुकी हैं और विशाल भारद्वाज ने इस पर चर्चित फिल्म ओमकाराभी बनाई है लेकिन जैसा कि हर महान कृति की खूबसूरती होती है, उसकी नई व्याख्याएं होती रहती हैं और उसमें से नए नए अर्थ निकलते रहते हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी त्रिपुरारी शर्मा ने पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे साल के छात्रों के साथ नौटंकी शैली में इसे मौन एक मासूम सानाम से मंचित किया। ओथेलो और डेसडेमोना के प्रेम और अविश्वास की कहानी तो जगत विख्यात है लेकिन त्रिपुरारी शर्मा की इस प्रस्तुति की खासियत यह रही कि इस पूरे प्रकरण को एक नारीवादी नजरिए से भी दिखाया गया। आलोच्य नाटक शेक्सपीयर के नाटक ओथेलो की चारित्रिक कमजोरी पर केंद्रित है और उसके खुद के पश्चाताप और आत्मपीड़ा की भावना को भी व्यक्त करता है। लेकिन मौन एक मासूम साडेसडेमोना के दर्द का एहसास कराता है। और उसी बहाने नारी की पीड़ा रेखांकित करता है। हर कहानी अपने भीतर कई कहानियों को समेटे रहती है। अक्सर हम एक वक्त में उस कहानी को एक खास पहलू से देखते हैं लेकिन वक्त बदलने के साथ उसके दूसरे पहलू को देखने की जरूरत होती है। त्रिपुरारी शर्मा ने शेक्सपीयर की रचना को एक नए अंदाज में देखा। लेकिन यह शैली भर नहीं है। यह आज के विचार की मांग भी है। आज की तारीख में ओथेलो की भूल या उसके पश्चाताप का उतना महत्व नहीं है जितना डेसडेमोना के दर्द का है। डेसडेमोना निश्च्छल है लेकिन उसे अपनी निश्च्छलता की कीमत चुकानी पड़ती है। नौटंकी एक पारंपरिक लोकशैली है। इसमें गायन की खास भूमिका होती है। स्वाभाविक है कि मौन एक मासूम सामें भी गीतों की भरमार है। त्रिपुरारी शर्मा ने चूंकि इसे ब्रज और विशेषकर मथुरा-वृंदावन के माहौल में रूपांतरित किया है इसलिए वहां की कई परंपराएं भी इसमें आ गई। जैसे मथुरा में मल्लयुद्ध की परंपरा रही है। इसका आरंभ महाभारत काल और भगवान कृष्ण से होता है। लेकिन आज भी वह परंपरा जीवित है। दिल्ली में मास्टर चंदगीराम का अखाड़ा मथुरा के अखाड़े का ही विकास है। बहरहाल मौन एक मासूम सामें पहलवानी और मल्लयुद्ध की भी झांकी है। इसके अलावा मथुरा में डेरा नाम का एक पारंपरिक शस्त्र होता हैं, जिसमें चाकू लगे होते हैं और जिसे हाथ से घुमाकर मारा जाता है। उसका भी यहां बहुत अच्छा इस्तेमाल हुआ है। इसे एक हाथ में रखकर चरखी की तरह घुमाते हैं। इस प्रस्तुति में डेरा का भी इस्तेमाल किया गया, हालांकि उसमें चाकू नहीं थे। लेकिन इसके कलात्मक इस्तेमाल से न सिर्फ दृश्यात्मक विविधता पैदा हुई बल्कि एक लोकशास्त्र का आधुनिक रंगमंच पर आगमन भी हुआ। ब्रज लास्य की भूमि मानी जाती है। पर वीरता और पराक्रम से भी उसका रिश्ता रहा है। यह नाटक यह भी याद दिलाता है। दरअसल आधुनिकता सिर्फ नए या समकालीन से जुड़ना नहीं है बल्कि वह परंपरा का पुनराविष्कार भी है। ब्रज की कई स्थानीय परंपराओं को समेट कर त्रिपुरारी शर्मा ने एक पश्चिमी नाटक को आधुनिक भारतीय रंग भी दे दिया। उसमें रास के तत्व भी लिए और वहीं के संगीत का रस भी घोल दिया। मंच सज्जा भी बिल्कुल मथुरा और वृंदांवन के इलाके में बने मकानों से ली गई थी। वृंदावन के निधिवन के बारे में लोकमान्यता है कि वहां रात में कृष्ण राधा से मिलने आते हैं और प्रात: राधा की चूडियां बिखरी मिलती है। नाटक में इस लोकविश्वास की भी बड़ा सृजनात्मक इस्तेमाल हुआ है।


प्रियतम की याद में खुद को खोने की तकनीक


Wednesday, February 2, 2011

अंजलि इला मेनन की कला-चिंता


समकालीन भारतीय चित्रकला में अंजलि इला मेनन को विशिष्ट जगह हासिल है। पिछले हफ्ते ललित कला अकादमी के परिसर मेंकलाकार से मिलिएकार्यक्रम में रूपिका चावला के साथ बात करते हुए उन्होंने सिर्फ अपनी कलायात्रा के विभिन्न पड़ावों के बारे में बताया, बल्कि कुछ ऐसी बातें भी बतायीं जो आज की कला के सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़ी हैं। अक्सर सवाल उठता है कि आज की कला जब बाजार के जबर्दस्त दबाव में है और सिर्फ कला गैलरियां और संग्राहक ही आधुनिक कला को नियंत्रित कर रहे हैं तो ऐसे में क्या कला और कलाकार की समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बची है? आखिर जब किसी कलाकार की बनाई कलाकृतियां गैलरियों की ही शोभा बढ़ाती रहेंगी तो आम लोग उन्हें कैसे देखेंगे? जैसे-जैसे आधुनिक कला का व्यापार बढ़ रहा है और भारतीय कलाकार भी करोड़ों में बिक रहे हैं तो सामान्य जन की पहुंच कला तक कैसे होगी? आम क्या, जब खास लोग भी कलाकृति खरीदने की ताकत नहीं रखते तो फिर पेंटिग जैसी कला को जनसाधारण से कैसे जोड़ा जाएगा? अंजलि इला मेनन का कहना है कि वे खुद चाहती हैं कि सामान्य आदमी तक अपनी कला पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि म्यूरल जैसी कला को ज्यादा तवज्जो दें और इसके लिए वह निशुल्क काम करने को तैयार हैं लेकिन मुश्किल यह है कि सरकार या सार्वजनिक सरकारी उपक्रमों को इसके लिए जो उत्साह और तप्तरता दिखानी चाहिए, वो नहीं दिखायी जाती है। एक बार उन्होंने विज्ञान भवन की एक बड़ी दीवार पर म्यूरल बनाने के लिए सरकार के सामने प्रस्ताव रखा और कहा कि मैं इसके लिए कोई फीस नहीं लूंगी। कुल खर्चा लगभग दो-तीन लाख का बन रहा था। इतना सुनने के बाद बैठक में शामिल एक इंजीनियर ने कहा कि अगर इतना कम खर्चा है तो दो तीन साल के बाद उस म्यूरल को हटाकर कोई दूसरा म्यूरल भी बनाया जा सकता है! यानी अनेक सरकारी अधिकारी इस बात को समझते ही नहीं कि म्यूरल जैसी कला का क्या महत्व है। उनके लिए म्यूरल का वही महत्व है जैसी दीवार की रंगाई-पुताई का होता है। जैसे आप हर दो-तीन साल पर दीवार की सफेदी कराते हैं उसी तरह हर दो तीन साल पर नए म्यूरल बनवा सकते हैं ! अगर कला के बारे में इस तरह का दृष्टिकोण रहेगा तो सार्वजनिक स्थलों पर आधुनिक कला को प्रश्रय कैसे मिलेगा? अंजलि इला मेनन ने कोलकोता मेट्रो के लिए फाइवर ग्लास का एक म्यूरल बनाया है जो काफी चर्चित रहा है। हालांकि इस म्यूरल को भी मेट्रो रेल के अधिकारियों की नामसमझी का शिकार होना पड़ा पर यह अलग कहानी है। मूल बात यह है कि सरकार और सरकारी अधिकारी खुद कला को लेकर संवेदनशील नहीं हैं और इसी कारण कलाकारों का समुदाय अपनी प्रतिभा का सामाजिक इस्तेमाल नहीं कर पाता है। भारतीय तंत्र और कला के बीच के बीच आधुनिक समय में जो खाई बनी, वह लगातार और गहराती जा रही है। आकस्मिक नहीं कि शहरों के योजनाकार और प्रशासक सिर्फ कंक्रीट के जंगल बनाने पर जोर देते हैं। भारत के गांवों में पहले जो मकान बनते थे, उनमें काफी चित्रकारी होती थी। लेकिन वहां भी अब जिस तरह के मकान बन रहें हैं, उनमें चित्रकारी गायब हो रही है। आदिवासी समाज में उसकी झलक जरूर दिख जाती है लेकिन बाकी लोग अपने लिए जिस तरह के आवास निर्मिंत कर रहे हैं, अपने लिए जिन सामुदायिक जगहों का निर्माण कर रहे हैं, उनमें पारंपरिक कला को जगह दी जा रही है आधुनिक कला को। जब कला का सामाजिक आधार नहीं बचेगा तो साफ है कि वह गैलरियों और करोड़पति संग्राहकों के नियंतण्रमें चली जाएगी।