समकालीन भारतीय चित्रकला में अंजलि इला मेनन को विशिष्ट जगह हासिल है। पिछले हफ्ते ललित कला अकादमी के परिसर में ‘कलाकार से मिलिए’ कार्यक्रम में रूपिका चावला के साथ बात करते हुए उन्होंने न सिर्फ अपनी कलायात्रा के विभिन्न पड़ावों के बारे में बताया, बल्कि कुछ ऐसी बातें भी बतायीं जो आज की कला के सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़ी हैं। अक्सर सवाल उठता है कि आज की कला जब बाजार के जबर्दस्त दबाव में है और सिर्फ कला गैलरियां और संग्राहक ही आधुनिक कला को नियंत्रित कर रहे हैं तो ऐसे में क्या कला और कलाकार की समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बची है? आखिर जब किसी कलाकार की बनाई कलाकृतियां गैलरियों की ही शोभा बढ़ाती रहेंगी तो आम लोग उन्हें कैसे देखेंगे? जैसे-जैसे आधुनिक कला का व्यापार बढ़ रहा है और भारतीय कलाकार भी करोड़ों में बिक रहे हैं तो सामान्य जन की पहुंच कला तक कैसे होगी? आम क्या, जब खास लोग भी कलाकृति खरीदने की ताकत नहीं रखते तो फिर पेंटिग जैसी कला को जनसाधारण से कैसे जोड़ा जाएगा? अंजलि इला मेनन का कहना है कि वे खुद चाहती हैं कि सामान्य आदमी तक अपनी कला पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि म्यूरल जैसी कला को ज्यादा तवज्जो दें और इसके लिए वह निशुल्क काम करने को तैयार हैं लेकिन मुश्किल यह है कि सरकार या सार्वजनिक सरकारी उपक्रमों को इसके लिए जो उत्साह और तप्तरता दिखानी चाहिए, वो नहीं दिखायी जाती है। एक बार उन्होंने विज्ञान भवन की एक बड़ी दीवार पर म्यूरल बनाने के लिए सरकार के सामने प्रस्ताव रखा और कहा कि मैं इसके लिए कोई फीस नहीं लूंगी। कुल खर्चा लगभग दो-तीन लाख का बन रहा था। इतना सुनने के बाद बैठक में शामिल एक इंजीनियर ने कहा कि अगर इतना कम खर्चा है तो दो तीन साल के बाद उस म्यूरल को हटाकर कोई दूसरा म्यूरल भी बनाया जा सकता है! यानी अनेक सरकारी अधिकारी इस बात को समझते ही नहीं कि म्यूरल जैसी कला का क्या महत्व है। उनके लिए म्यूरल का वही महत्व है जैसी दीवार की रंगाई-पुताई का होता है। जैसे आप हर दो-तीन साल पर दीवार की सफेदी कराते हैं उसी तरह हर दो तीन साल पर नए म्यूरल बनवा सकते हैं ! अगर कला के बारे में इस तरह का दृष्टिकोण रहेगा तो सार्वजनिक स्थलों पर आधुनिक कला को प्रश्रय कैसे मिलेगा? अंजलि इला मेनन ने कोलकोता मेट्रो के लिए फाइवर ग्लास का एक म्यूरल बनाया है जो काफी चर्चित रहा है। हालांकि इस म्यूरल को भी मेट्रो रेल के अधिकारियों की नामसमझी का शिकार होना पड़ा पर यह अलग कहानी है। मूल बात यह है कि सरकार और सरकारी अधिकारी खुद कला को लेकर संवेदनशील नहीं हैं और इसी कारण कलाकारों का समुदाय अपनी प्रतिभा का सामाजिक इस्तेमाल नहीं कर पाता है। भारतीय तंत्र और कला के बीच के बीच आधुनिक समय में जो खाई बनी, वह लगातार और गहराती जा रही है। आकस्मिक नहीं कि शहरों के योजनाकार और प्रशासक सिर्फ कंक्रीट के जंगल बनाने पर जोर देते हैं। भारत के गांवों में पहले जो मकान बनते थे, उनमें काफी चित्रकारी होती थी। लेकिन वहां भी अब जिस तरह के मकान बन रहें हैं, उनमें चित्रकारी गायब हो रही है। आदिवासी समाज में उसकी झलक जरूर दिख जाती है लेकिन बाकी लोग अपने लिए जिस तरह के आवास निर्मिंत कर रहे हैं, अपने लिए जिन सामुदायिक जगहों का निर्माण कर रहे हैं, उनमें न पारंपरिक कला को जगह दी जा रही है न आधुनिक कला को। जब कला का सामाजिक आधार नहीं बचेगा तो साफ है कि वह गैलरियों और करोड़पति संग्राहकों के नियंतण्रमें चली जाएगी।
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