शेक्सपीयर का मशहूर नाटक ‘ओथेलो’ विश्वास-अविश्वास के मनोभावों की टकराहट का नाटक है। ओथेलो डेसडेमोना से प्रेम करता है, उससे विवाह करता है लेकिन शक की वजह से उसको मार भी देता है। यों तो इस नाटक की भारत में कई प्रस्तुतियां हो चुकी हैं और विशाल भारद्वाज ने इस पर चर्चित फिल्म ओमकारा’ भी बनाई है लेकिन जैसा कि हर महान कृति की खूबसूरती होती है, उसकी नई व्याख्याएं होती रहती हैं और उसमें से नए नए अर्थ निकलते रहते हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी त्रिपुरारी शर्मा ने पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे साल के छात्रों के साथ नौटंकी शैली में इसे ‘मौन एक मासूम सा’ नाम से मंचित किया। ओथेलो और डेसडेमोना के प्रेम और अविश्वास की कहानी तो जगत विख्यात है लेकिन त्रिपुरारी शर्मा की इस प्रस्तुति की खासियत यह रही कि इस पूरे प्रकरण को एक नारीवादी नजरिए से भी दिखाया गया। आलोच्य नाटक शेक्सपीयर के नाटक ओथेलो की चारित्रिक कमजोरी पर केंद्रित है और उसके खुद के पश्चाताप और आत्मपीड़ा की भावना को भी व्यक्त करता है। लेकिन ‘मौन एक मासूम सा’ डेसडेमोना के दर्द का एहसास कराता है। और उसी बहाने नारी की पीड़ा रेखांकित करता है। हर कहानी अपने भीतर कई कहानियों को समेटे रहती है। अक्सर हम एक वक्त में उस कहानी को एक खास पहलू से देखते हैं लेकिन वक्त बदलने के साथ उसके दूसरे पहलू को देखने की जरूरत होती है। त्रिपुरारी शर्मा ने शेक्सपीयर की रचना को एक नए अंदाज में देखा। लेकिन यह शैली भर नहीं है। यह आज के विचार की मांग भी है। आज की तारीख में ओथेलो की भूल या उसके पश्चाताप का उतना महत्व नहीं है जितना डेसडेमोना के दर्द का है। डेसडेमोना निश्च्छल है लेकिन उसे अपनी निश्च्छलता की कीमत चुकानी पड़ती है। नौटंकी एक पारंपरिक लोकशैली है। इसमें गायन की खास भूमिका होती है। स्वाभाविक है कि ‘मौन एक मासूम सा’ में भी गीतों की भरमार है। त्रिपुरारी शर्मा ने चूंकि इसे ब्रज और विशेषकर मथुरा-वृंदावन के माहौल में रूपांतरित किया है इसलिए वहां की कई परंपराएं भी इसमें आ गई। जैसे मथुरा में मल्लयुद्ध की परंपरा रही है। इसका आरंभ महाभारत काल और भगवान कृष्ण से होता है। लेकिन आज भी वह परंपरा जीवित है। दिल्ली में मास्टर चंदगीराम का अखाड़ा मथुरा के अखाड़े का ही विकास है। बहरहाल ‘मौन एक मासूम सा’ में पहलवानी और मल्लयुद्ध की भी झांकी है। इसके अलावा मथुरा में डेरा नाम का एक पारंपरिक शस्त्र होता हैं, जिसमें चाकू लगे होते हैं और जिसे हाथ से घुमाकर मारा जाता है। उसका भी यहां बहुत अच्छा इस्तेमाल हुआ है। इसे एक हाथ में रखकर चरखी की तरह घुमाते हैं। इस प्रस्तुति में डेरा का भी इस्तेमाल किया गया, हालांकि उसमें चाकू नहीं थे। लेकिन इसके कलात्मक इस्तेमाल से न सिर्फ दृश्यात्मक विविधता पैदा हुई बल्कि एक लोकशास्त्र का आधुनिक रंगमंच पर आगमन भी हुआ। ब्रज लास्य की भूमि मानी जाती है। पर वीरता और पराक्रम से भी उसका रिश्ता रहा है। यह नाटक यह भी याद दिलाता है। दरअसल आधुनिकता सिर्फ नए या समकालीन से जुड़ना नहीं है बल्कि वह परंपरा का पुनराविष्कार भी है। ब्रज की कई स्थानीय परंपराओं को समेट कर त्रिपुरारी शर्मा ने एक पश्चिमी नाटक को आधुनिक भारतीय रंग भी दे दिया। उसमें रास के तत्व भी लिए और वहीं के संगीत का रस भी घोल दिया। मंच सज्जा भी बिल्कुल मथुरा और वृंदांवन के इलाके में बने मकानों से ली गई थी। वृंदावन के निधिवन ’ के बारे में लोकमान्यता है कि वहां रात में कृष्ण राधा से मिलने आते हैं और प्रात: राधा की चूडियां बिखरी मिलती है। नाटक में इस लोकविश्वास की भी बड़ा सृजनात्मक इस्तेमाल हुआ है।
Sunday, February 20, 2011
‘ओथेलो ’ की ब्रजमयी प्रस्तुति
शेक्सपीयर का मशहूर नाटक ‘ओथेलो’ विश्वास-अविश्वास के मनोभावों की टकराहट का नाटक है। ओथेलो डेसडेमोना से प्रेम करता है, उससे विवाह करता है लेकिन शक की वजह से उसको मार भी देता है। यों तो इस नाटक की भारत में कई प्रस्तुतियां हो चुकी हैं और विशाल भारद्वाज ने इस पर चर्चित फिल्म ओमकारा’ भी बनाई है लेकिन जैसा कि हर महान कृति की खूबसूरती होती है, उसकी नई व्याख्याएं होती रहती हैं और उसमें से नए नए अर्थ निकलते रहते हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी त्रिपुरारी शर्मा ने पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे साल के छात्रों के साथ नौटंकी शैली में इसे ‘मौन एक मासूम सा’ नाम से मंचित किया। ओथेलो और डेसडेमोना के प्रेम और अविश्वास की कहानी तो जगत विख्यात है लेकिन त्रिपुरारी शर्मा की इस प्रस्तुति की खासियत यह रही कि इस पूरे प्रकरण को एक नारीवादी नजरिए से भी दिखाया गया। आलोच्य नाटक शेक्सपीयर के नाटक ओथेलो की चारित्रिक कमजोरी पर केंद्रित है और उसके खुद के पश्चाताप और आत्मपीड़ा की भावना को भी व्यक्त करता है। लेकिन ‘मौन एक मासूम सा’ डेसडेमोना के दर्द का एहसास कराता है। और उसी बहाने नारी की पीड़ा रेखांकित करता है। हर कहानी अपने भीतर कई कहानियों को समेटे रहती है। अक्सर हम एक वक्त में उस कहानी को एक खास पहलू से देखते हैं लेकिन वक्त बदलने के साथ उसके दूसरे पहलू को देखने की जरूरत होती है। त्रिपुरारी शर्मा ने शेक्सपीयर की रचना को एक नए अंदाज में देखा। लेकिन यह शैली भर नहीं है। यह आज के विचार की मांग भी है। आज की तारीख में ओथेलो की भूल या उसके पश्चाताप का उतना महत्व नहीं है जितना डेसडेमोना के दर्द का है। डेसडेमोना निश्च्छल है लेकिन उसे अपनी निश्च्छलता की कीमत चुकानी पड़ती है। नौटंकी एक पारंपरिक लोकशैली है। इसमें गायन की खास भूमिका होती है। स्वाभाविक है कि ‘मौन एक मासूम सा’ में भी गीतों की भरमार है। त्रिपुरारी शर्मा ने चूंकि इसे ब्रज और विशेषकर मथुरा-वृंदावन के माहौल में रूपांतरित किया है इसलिए वहां की कई परंपराएं भी इसमें आ गई। जैसे मथुरा में मल्लयुद्ध की परंपरा रही है। इसका आरंभ महाभारत काल और भगवान कृष्ण से होता है। लेकिन आज भी वह परंपरा जीवित है। दिल्ली में मास्टर चंदगीराम का अखाड़ा मथुरा के अखाड़े का ही विकास है। बहरहाल ‘मौन एक मासूम सा’ में पहलवानी और मल्लयुद्ध की भी झांकी है। इसके अलावा मथुरा में डेरा नाम का एक पारंपरिक शस्त्र होता हैं, जिसमें चाकू लगे होते हैं और जिसे हाथ से घुमाकर मारा जाता है। उसका भी यहां बहुत अच्छा इस्तेमाल हुआ है। इसे एक हाथ में रखकर चरखी की तरह घुमाते हैं। इस प्रस्तुति में डेरा का भी इस्तेमाल किया गया, हालांकि उसमें चाकू नहीं थे। लेकिन इसके कलात्मक इस्तेमाल से न सिर्फ दृश्यात्मक विविधता पैदा हुई बल्कि एक लोकशास्त्र का आधुनिक रंगमंच पर आगमन भी हुआ। ब्रज लास्य की भूमि मानी जाती है। पर वीरता और पराक्रम से भी उसका रिश्ता रहा है। यह नाटक यह भी याद दिलाता है। दरअसल आधुनिकता सिर्फ नए या समकालीन से जुड़ना नहीं है बल्कि वह परंपरा का पुनराविष्कार भी है। ब्रज की कई स्थानीय परंपराओं को समेट कर त्रिपुरारी शर्मा ने एक पश्चिमी नाटक को आधुनिक भारतीय रंग भी दे दिया। उसमें रास के तत्व भी लिए और वहीं के संगीत का रस भी घोल दिया। मंच सज्जा भी बिल्कुल मथुरा और वृंदांवन के इलाके में बने मकानों से ली गई थी। वृंदावन के निधिवन ’ के बारे में लोकमान्यता है कि वहां रात में कृष्ण राधा से मिलने आते हैं और प्रात: राधा की चूडियां बिखरी मिलती है। नाटक में इस लोकविश्वास की भी बड़ा सृजनात्मक इस्तेमाल हुआ है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment