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Sunday, May 15, 2011

कला समीक्षा का ‘कैनवास’


हिंदी के कई अभाव हैं। इनमें एक अभाव स्तरीय कला-पत्रिकाओं का न होना भी है। पेंटिंग, मूर्तिशिल्प या इंस्टालेशन जैसी दूसरी चाक्षुष कलाओं में भारत की काफी सक्रियताएं है। नई सोच है। लेकिन उनके बारे में अगर आप हिंदी माध्यम से जानना चाहें तो कुछ कदम चलने के साथ रुक जाना पड़ेगा। फिलहाल सिर्फ चाक्षुष कलाओं की बात करें तो यह दुनिया भी कई तरह के प्रयोगों, हलचलों, बहसों और बैचेनियों से भरी पड़ी है। इन सबके बारे में जानने और इनमें कुछ जोड़ने के लिए भी कई पत्रिकाओं की जरूरत है। निस्संदेह चाक्षुष कला दृश्यों के माध्यम से सोचती है पर उस सोच को दूसरे तक पहुंचाने के लिए शब्दों की आवश्यकता भी पड़ती है। पत्रिकाएं सोच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती हैं। यह खुशी की बात है कि कला-प्रशासक और समीक्षक विनय कुमार और उनके कुछ मित्रों ने ‘कैनवास’ नाम से नई पत्रिका निकाली है। इसका प्रवेशांक ही न्यू मीडिया पर केंद्रित है। न्यू मीडिया से तात्पर्य डिजिटल मीडिया से है। डिजिटल मीडिया ने चाक्षुष कलाओं की दुनिया में बड़ा बदलाव किया है और यह प्रकिया जारी है। यह कलाओं में उत्तर आधुनिकता की प्रक्रिया है। प्रवेशांक में इसी प्रक्रिया को देखने-समझने की कोशिश है। इसमें वरिष्ठ कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल के अलावा अवधेश मिश्र, संध्या बोर्डवेकर, पण्रामिता बोरगेहेन, मनोज कुलकर्णी, वंदना सिंह और ज्योतिष जोशी सहित अनेक लेखकों की रचनाएं शामिल हैं। प्रवेशांक का जोर ‘न्यू मीडिया’ पर है, अत: उसके बारे में सामग्री ज्यादा है पर कला संबंधी दूसरे पक्षों को रेखांकित करनेवाले आलेख भी इसमें हैं। जिसे ‘न्यू मीडिया कहते हैं, यानी डिजिटल टेक्नोलॉजी या कंप्यूटर के सहयोग और उपयोग से निर्मिंत कला, वह अब भी भारतीय कला जगत में संदेहास्पद स्थिति में है। पेंटिग की पारंपरिक शैली के बारे में कइयों को लगता है कि वह कला और कलाकार की निश्च्छलता से बनती है और डिजिटल कला के बारे में बहुतों का सोचना है कि उस पर बाजार का दबाव रहता है। पत्रिका के शामिल लेखों में भी इस तरह का संशय है। अपने लेख ‘कला, कला का समय और रचनात्मक मूल्य’ में राजेश कुमार व्यास न्यू मीडिया को लेकर इसी तरह का संशय प्रस्तुत करते हैं। पर अनिरुद्ध चारी बताते हैं कि डिजिटल कला के भीतर कलाओं को लोकतांत्रिक करने की क्षमता है। यानी ज्यादा से ज्यादा लोग कलाकार बन सकते हैं। वीडियो और फोटोग्राफी जैसी प्रविधियों और इंस्टालेशन जैसी शैलियों ने कला और कलाकारों के लिए दृष्टि और अवसर ही नहीं, नई कल्पनाशीलता भी पैदा की है। इनकी वजह से कला की व्यापकता बढ़ी है। लेकिन क्या व्यापकता बढ़ने के साथ-साथ कला की गुणवत्ता का भी प्रसार होता है? इस प्रश्न को भी कुछ लेखों में उठाया गया है। अन्य लेखों में भारत में न्यू मीडिया के आगमन और उसके समय के साथ विस्तार के क्रमिक विकास को भी दिखाया गया है। प्रयाग शुक्ल ने अपने लेख में चिंता जताई है कि आजकल कई अधकचरी चीजों को भी कला के नाम पर परोसा जा रहा है। यह भी एक खतरनाक स्थिति है और साथ ही कला विरोधी भी। हिंदी में अभी जो थोड़ी बहुत कला पत्रिकाएं निकल रही हैं, उनकी कमजोरी यह भी है कि उनमें कलाकृतियों के फोटोग्राफ कम होते हैं, या नहीं के बराबर। सौभाग्य से ‘कैनवास’ में यह स्थिति नहीं है। इसमें कई कलाकृतियों और कलाकारों के अच्छे फोटोग्राफ हैं। भारत से कई शहरों और स्थानों में जो कला-गतिविधियां चल रही हैं उनके बारे में रिपोर्ट भी यहां हैं। ‘कैनवास’ ने अच्छी संभावना जगाई है।


Monday, April 25, 2011

विश्व बाजार में पिछड़ती भारतीय कला


अंतरराष्ट्रीय कला बाजार से जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक चीनी कला की मांग बड़ी तेजी से बढ़ रही है। यूरोप पिछड़ रहा है और भारत की तो कोई गिनती ही नहीं है। सबसे ताजा आंकड़ा यह है कि अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में चीनी कला का शेयर पहले स्थान पर है यानी 34 प्रतिशत। अमेरिका भी चीन से पीछे है जो 30 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है। चीनी कला का व्यापार 2010 में तीन अरब डॉलर से ज्यादा का रहा तो अमेरिका का दो अरब अस्सी करोड़ डॉलर का। इसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस का स्थान है। इस हिसाब से देखें तो भारतीय कला की हालत बहुत पतली है। दुनिया के चोटी के छह कलाकारों में तीन चीनी हैं और दुनिया के सौ शीर्षस्थ कलाकारों में एक भी भारतीय नहीं है। हां दुनिया के 500 कलाकारों की सूची में कुछ भारतीय जरूर हैं। मकबूल फिदा हुसैन का स्थान 136 वां है। मकबूल फिदा हुसैन (हालांकि वे अब भारतीय नहीं रहे), सुबोध गुप्ता, भारती खेर और अर्पिता सिंह जैसे कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो दुनिया के कला बाजार में भारतीय कलाकारों को ज्यादा कीमत नहीं मिल रही है जबकि कई चीनी कलाकारों की कृतियां ज्यादा महंगे दामों पर बिक रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों और योजनाकारों के लिए कला की कोई खास हैसियत नहीं है। बेशक सूजा या रजा जैसे कुछ भारतीय कलाकारों ने अपनी मेधा और परिश्रम से भारतीय कला को विश्व स्तर पर पहुंचाया लेकिन सरकारी नीतियां कला और कला बाजार को लेकर उत्साहहीन रही हैं। अगर दुनिया में चीनी कला और कलात्मक वस्तुओं (बर्तन आदि) की मांग बढ़ रही है तो उसके पीछे चीनी सरकार की अपनी योजनाएं भी रही हैं। यह ठीक है कि चीन में कई कलाकारों को राजनैतिक दमन से भी गुजरना पड़ा लेकिन वहां की सरकार ने अपने यहां 'कला जिला' बनाकर कला को आर्थिक आकांक्षाओं से भी जोड़ा। हालांकि कुछ कला संस्थान हमारे यहां भी बने लेकिन वे अर्थव्यवस्था के साथ कदमताल नहीं कर पाए। समकालीन कला के सर्जनात्मक आयाम को विकसित करने के लिए ललित कला अकादेमी बनी लेकिन वह कलाकारों की समकालीन राजनीति में इतनी बुरी तरह फंसी कि वहां से निकल नहीं पा रही है। विश्व की कला संस्थाओं में उसकी कोई जगह नहीं है। यह अकादेमी पिछले छह सालों से अंतरराष्ट्रीय कला त्रैवार्षिकी का आयोजन करने में असमर्थ रही है। अगर यही जारी रहा तो फिर भारतीय कला विश्व स्तर या विश्व बाजार में कैसे पहुंचेगी। पिछले दिनों ललित कला अकादेमी ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक प्रेस कांफ्रेस कर इस बात पर अपनी ही पीठ ठोकी वह 'वेनिस द्वैवार्षिकी' में शिरकत करने जा रही है। लेकिन अकादमी के पदाधिकारियों के पास इस बात का जवाब नहीं था कि वे खुद इस तरह के अंतरराष्ट्रीय कला आयोजन नहीं कर पाते। इस अयोग्यता का क्या कारण है? यह तो समकालीन कला से जुड़ी स्थिति है। पारंपरिक भारतीय कलाओं के संवर्धन और विकास के लिए तो भारत में कोई संस्थान ही नहीं है। जबकि चीनी सरकर अपनी पारंपरिक कलाओं पर खास ध्यान देती हैं। चीनी बर्तनों की मांग हर देश में बढ़ रही है। चीनी जलरंग तो भारत के ड्राइंग रूम तक की शोभा बढ़ा रहे हैं। कला समीक्षकों की दृष्टि भी पारंपरिक भारतीय चित्रकारी और कलाकारी पर नहीं जाती। हालांकि भारतीय पारंपरिक कलाओं में भी कई तरह की विविधता और विशिष्टताएं हैं लेकिन कला को लेकर कोई योजनाबद्ध दृष्टि न रहने से भारतीय घरों और ड्राइंग रूम में भी पारंपरिक कलाओं को कोई खास जगह नहीं मिलती।

Monday, April 18, 2011

पिकासो के अमूर्त शैली के चित्रों में भावनाएं


क्यूबिज्म और मॉडर्न आर्ट विधा का चित्रकला जगत में एक खास स्थान है और इन दोनों ही विधाओं को स्थापित करने का श्रेय एक ही चित्रकार यानी पाब्लो पिकासो को जाता है। वह ऐसे चित्रकार थे, जिन्होंने न सिर्फ सामयिक घटनाओं को अपने चित्रों में बयां किया, बल्कि एक ऐसी अमूर्त शैली विकसित की, जिसमें भावनाएं तलाशी जा सकती थीं। 'क्यूबिज्म' फ्रांस में वर्ष 1907 में शुरू हुआ था और इस शैली के तहत पिकासो के त्रिआयामी चित्रों ने खासी लोकप्रियता बटोरी। पिकासो की गणना ऐसे चित्रकारों में भी होती है जिन्होंने अपने इर्दगिर्द हो रहे सामयिक घटनाक्र मों जैसे स्पेन के गृह युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध को भी अपने चित्रों में उकेरा। मध्य प्रदेश के जाने-माने चित्रकार जफर मोहम्मद बताते हैं कि मॉडर्न आर्ट शैली के तहत इन दिनों जिस तरह की अमूर्त शैली के चित्र बनाये जाते हैं, उनकी नींव एक तरह से पिकासो ने ही रखी थी। लेकिन उनकी चित्रकारी और अब की चित्रकारी में खासा फर्क है। उन्होंने कहा कि इन दिनों आड़ी-टेढ़ी लकीरों और रंगों के सम्मिशण्रको भी अमूर्त शैली के चित्रों में गिना जाता है लेकिन पिकासो ने एक अलग ही तरह की अमूर्त शैली के चित्र उकेरे जिनमें भावनाएं अभिव्यक्त रहती थीं और आप उन्हें तलाश सकते थे। युवा चित्रकार बताते हैं कि पिकासो के साथ एक दिलचस्प वाकया भी जुड़ा है। पिकासो ने स्पेन के गृह युद्ध के दौरान जर्मनी द्वारा बरसाये गए बमों के बाद के हालात को बयां करती एक पेंटिंग 'गुरनिका' बनाई थी जो उनकी सर्वाधिक प्रशंसनीय कलाकृतियों में है। मोहम्मद के अनुसार, कहा जाता है कि फ्रांस में एक बार हिटलर एक प्रदर्शनी देखने पहुंचे जिसमें 'गुरनिका' को रखा गया था और वहां पिकासो भी मौजूद थे। कलाकृति पर नजरें टिकने पर हिटलर ने वहां मौजूद लोगों से पूछा कि यह चित्र किसने बनाया है। इस पर पीछे खड़े पिकासो ने कटाक्ष किया कि इस चित्र के असली रचयिता तो वह (हिटलर) ही हैं। कै िर के च्ा र आर्टिस्ट इरशाद कप्तान बताते हैं कि इन दिनों जो युवा मॉडर्न आर्ट और अमूर्त शैली की चित्रकारी सीख रहे हैं, उसकी बुनियाद पिकासो के चित्रों में ही मिलती है। उन्होंने कहा कि उनके चित्र हमारे लिए धरोहर की तरह हैं। उन्होंने अपने रचनाकाल में जितनी कलाकृतियां दीं, वे खजाने के रूप में इस दुनिया में हमेशा याद की जाएंगी। उनके 'क्यूबिज्म' और लाल तथा नीले रंग के चित्रों को दुनिया भर में आज भी सराहा जाता है। वेबसाइट 'आर्ट फैक्ट्स' ने बिक्री के लिहाज से वर्ष 2010 के शीर्ष चित्रकारों में पिकासो को दूसरे क्र म पर रखा है। पिकासो की कलाकृति 'गारकन ए ला पाइप' ने तब सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये जब उसकी वर्ष 2004 में 10.4 करोड़ डॉलर में नीलामी हुई। स्पेन में 25 अक्तूबर 1881 को जन्मे पिकासो का चित्रकला की ओर रुझान बचपन से ही था। उन्होंने बार्सिलोना के कैफे में किशोरवय की उम्र से ही जाना शुरू कर दिया जहां बुद्धिजीवी जुटा करते थे। वह वर्ष 1900 के बाद पेरिस आ गए और उन्होंने मानेट, गुस्ताव कोरबेट और तोलुस लॉट्रेक की कलाकृतियों पर गौर करना शुरू किया। 'क्यूबिज्म' की शुरुआत से पहले पिकासो ने निराश्रितों और वेश्याओं के चरित्रों को कलाकृतियों में नीले रंग से रंगना शुरू किया जिसे 'ब्लू पीरियड' कहा गया। इसके बाद उन्होंने हल्के नीले, गुलाबी और लाल रंगों से चित्रकारी शुरू की जिसे पिकासो के कला जीवन का 'पिंक पीरियड' कहा गया। पिकासो के 'क्यूबिज्म' शैली के चित्रों ने खासी लोकप्रियता बटोरी जिसमें उन्होंने त्रि-आयामी आकार में मानव चरित्रों को उकेरना शुरू किया। इसकी लोकप्रियता इस हद तक थी कि फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम और अमेरिकी चित्रकारों ने भी तेजी से 'क्यूबिज्म' को अपनाना शुरू कर दिया। स्पेन में 1937 में जब गृह युद्ध शुरू हुआ तो पिकासो फ्रांस में रहते थे और उन्होंने अपनी जन्मभूमि पर हो रहे रक्तपात को अपने चित्रों में उकेरना शुरू किया। वह 1944 में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और उन्होंने कोरियाई युद्ध में अमेरिका के दखल देने के विरोध में कलाकृतियां बनायीं। आठ अप्रैल 1973 को फ्रांस में ही उनका 91 वर्ष की उम्र में निधन हुआ।पिकासो की कलाकृतियां बिक्री में मामले में आज भी सबसे आगे रहती हैं। बताया जाता है कि उनकी 500 से अधिक बेमिसाल कलाकृतियां उनके निधन के बाद लापता हो गई।

Sunday, April 10, 2011

विविध कलाकारों का संगम स्थल


देश में आयोजित होने वाले प्रमुख संगीत आयोजनों के बीच इंडो ओक्सिडेन्टल सिमबियोसिस संगीत समारोह अपनी खास पहचान बना चुका है। कोलकाता के इस संगठन ने राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नेशनल फेस्टिवल ऑफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक एंड डांस के नाम से समारोह करवाने में नया कीर्तिमान स्थापित किया है। पिछले पांच सालों से हो रहे इस महोत्सव में देश के अनगिनत प्रखर और नये प्रतिभाशाली कलाकारों की आवाजाही हो रही है। हाल ही में यह समारोह दिल्ली में आयोजित किया गया। नई दिल्ली के कमानी सभागार में पांच दिन तक होने वाला यह महोत्सव संगीत के शिखर पुरुष पंडित भीमसेन जोशी को समर्पित था। इसमें संगीत और नृत्य के लगभग 21 कलाकार शामिल थे। गायन-वादन में प्रमुख कलाकार उस्ताद रशीद खां, पंडित अजय चक्रवर्ती, राजा-राधा रेड्डी मालविका साराभाई सुभद्रा गुहा, पंडित कुमार बोस, वैजंतीमाला, बेगम परवीन सुल्ताना, पूर्वायन चटर्जी और राजन-साजन मिश्र थे। उनके अलावा शहनाई में राजेन्द्र प्रसन्ना, सरोद में अयान अली खां, पंडित देबोज्योति बोस, तबला सोलो में उस्ताद हशमत अली अकरम खां, गायन में रितेश-रजनीश मिश्र, पारसारथी देशिकन, नृत्य में दीपक महाराज, विशाल कृष्ण, वास्वती-राम मोहन मिश्र, मालविका सेन और दुर्गा आर्य थीं। मंगलाचरण के रूप में समारोह का उद्घाटन राजेन्द्र प्रसन्ना के शहनाई वादन से हुआ। खयाल अंग की रागदारी और बनारस की पूरब अंग गायिकी का रस उनके वादन में बखूबी उभरा। मंगल प्रसाद के दुक्कड़ की संगत पर सुर और लय का अच्छा तानाबाना उनके वादन में था। कथक में पंडित बिरजू महाराज के पुत्र दीपक महाराज के नृत्य में अपने पिता की शैली और अनूठे अंदाज की पूरी झलक दिखती है। बहन स्थिता मिश्रा के साथ युगल नृत्य में अर्धनारीश्वर और तेरह मात्रा व तीनताल पर नृत्य करने में दीपक ने खूब समां बांधा। खयाल के मशहूर गायक उस्ताद रशीद खां द्वारा राग जोग और सोहिनी की प्रस्तुति में शुद्ध रागदारी और बंदिश की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने श्रोताओं को रसमग्न किया। उस्ताद अमजद अली खां के बेटे अयान अली द्वारा राग श्री की आलाप, जोड़ और गत को पेश करने के चलन में गमक मींड ताने, स्वराभिव्यंजना और लयकारी में अच्छी तराश नजर आई। उनके वादन को चार चांद लगाने में आनंदो-चटर्जी की तबला संगत बेजोड़ थी। पंडित अजय चक्रवर्ती ने भी ऊर्जा भरे खुले स्वर में राज शुद्ध कल्याण को रसपूर्णता से प्रस्तुत किया। पंडित राजन मिश्र के पुत्र राजेश-रजनीश की जोड़ी गायन के फलक पर तेजी से उभरी है। योगेश सम्सी के ओजपूर्ण तबला संगीत पर उन्होंने राग श्याम कल्याण से गायन की शुरुआत सुगमता और सरसता से की। विलंबित की बंदिश-'जियो मोरे लाल', मध्य तीनताल पर उन संग लागी लगन और द्रुत एकताल की बंदिश को उन्होंने खनकती और मधुर स्वर में पेश करने में रागदारी के रंग दिखाए। सरगम, तानों की निकास, मींड से लेकर विविधतापूर्ण लय के कई चलन उन्होंने खूबसूरती से पेश किये। आखिर में भजन 'हे गोविंद राखो शरण' की प्रस्तुति कर्णप्रिय थी। कोलकाता के देबोज्योति बोस ने सरोद पर राग कलावती को शुद्धता और सुरीले अंदाज में पेश किया। खमाज थाट के इस राग को बजाने में मीड और आंदोलन स्वर का लगाव बहुत आकर्षक था। आनंदो के प्रभावी तबला संगत पर उन्होंने लयकारी का भी चमत्कार दिखाया। शुभ्रा गुहा के गायन द्वारा पूरब अंग गायिकी में ठुमरी, चैती, काफी और दादरा में निबद्ध बंदिशों की प्रस्तुति स्वर और भाव में पूरी तरह सनी थीं। तबला के विख्यात वादक पंडित कुमार बोस ने एकल तबला वादन में अपनी बेजोड़ कला के दर्शन करवाये। तीनताल पर कायदा, पेशकार, गतें, परबा से लेकर लयकारी में अपनी थिरकती उंगलियों का कमाल वास्तव में अद्भुत था। पचासी साल की दहलीज पर पहुंच गई वैजंतीकाला आज भी भरतनाटय़म नृत्य की ऊर्जावान नृत्यांगना हैं। नृत्य के लिहाज से उनका शरीर अभी भी सुडौल और गठित है और चेहरे की भाव भंगिमाओ में पुरानी तराश बरकरार है। उन्होंने बाल्मीकि में रामायण से उद्द्धृत कई प्रसंगों को नृत्य और अभिनय में बड़ी उदात्तता से प्रस्तुत करके दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। नृत्य में उनका अडुव, अंग, पद संचालन और मुद्राओं की खूबसूरती बेहद रोमांचकारी थी। समापन के दिन कार्यक्रम दिन के 11 बजे से रात के 11 बजे तक चलता रहा। इसमें विदुषी प्रवीन सुल्ताना का गायन, राजा राधा रेड्डी का कुचिपुड़ी नृत्य, पूर्वायन चटर्जी का सितार वादन और राजन-साजन मिश्र का गायन कलानुरागियों को रिझाने में खास था। वास्वती मिश्रा और राममोहन महाराज का कथक में युगल नृत्य, मालविका सेन का भरतनाटय़म, पारसारथी देशिकन का खयाल गायन और दुर्गा आर्य का कथक नृत्य भी दर्शकों को लुभाने वाला दिखा।

Friday, March 4, 2011

डिसेबल्ड फ्रेंडली होंगे स्मारक


स्मारकों और संग्राहलयों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों का बनाने की दिशा में उन्हें डिसेबल्ड फ्रेंडली बनाया जाएगा। इसके तहत सबसे पहले दिल्ली के स्मारकों और संग्राहलयों को नेत्रहीनों के लिए सुगम बनाने के प्रयास किए जाएंगे। हालांकि अभी सांची के स्तूप और सारनाथ संग्राहलय डिसेबल्ड फ्रेंडली हैं लेकिन अब देश भर के सभी मुख्य स्मारकों को विकलांगों के लिए सुगम बनाने की कवाद शुरू की जाएगी। मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस द्वारा इस प्रोजेक्ट को फंड मुहैय्या कराने की भी संभावना है। भारतीय पुरातत्व सव्रेक्षण (एएसआई) दिल्ली के स्मारकों को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पेश करने की तैयारी कर रहा है। इसके तहत स्मारकों और संग्राहलयों में ब्रेल लिप में बोर्ड, स्पर्शनीय मानचित्र, ऑडियो गाइड ऐसे काम हैं जो स्मारकों में किए जाएंगे। स्मारकों को नेत्रहीनों के लिए ब्रेल लिपि के बोर्ड लगाए जाएंगे। साथ ही ब्रेल लिपि में उनके लिए गाइड मैप भी होगा ताकि वे समझ सकें कि कहां क्या है। इसके लिए एएसआई देश भर के विभिन्न सर्कल्स में कार्य शुरू करेगा लेकिन सबसे पहले यह काम दिल्ली में शुरू किया जाएगा। दिल्ली में लाल किला, हुमायूं का मकबरा, कुतुबमीनार, सफदरजंग का मकबरा और पुराना किला ऐसे स्मारक हैं जहां से इस योजना को शुरू किया जा सकता है। इस काम में एएसआई देहरादून के नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ विजुअली हेंडीकेप्ड की भी मदद लेगा। साइनेज व बोर्ड बनाने में संस्थान की मदद ली जाएगी। साथ ही विशेषज्ञों की भी राय ली जाएगी ताकि स्मारकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जा सके। साथ ही नक्शे और एग्जीबिटर स्पर्शनीय लगाए जाएंगे। प्रमुख स्मारकों में ऑडियो गाइड की सुविधा भी इस दिशा में एक अहम कदम होगा। इससे नेत्रहीनों के लिए स्मारक और संग्राहलय घूमना और उनके विषय में जानकारी प्राप्त करना बेहद आसान हो जाएगा। ऐसा होने से विदेशों के नेत्रहीन पर्यटक भी इसका भरपूर लाभ उठा सकेंगे और विदेशों में संदेश जाएगा कि भारत के संग्राहलय और स्मारक डिसेबल्ड फ्रेंडली हैं। साथ ही पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। एएसआई के आला अधिकारियों का मानना है कि इस कार्य के लिए फंड कोई मुद्दा नहीं है। मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस इस प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता देने के लिए दिलचस्पी दिखा चुका है। यदि इस प्रोजेक्ट को दिल्ली में कामयाबी मिल जाती है तो इसे देश के अन्य प्रमुख स्मारकों में भी शुरू किया जाएगा।


Sunday, February 20, 2011

‘ओथेलो ’ की ब्रजमयी प्रस्तुति


शेक्सपीयर का मशहूर नाटक ओथेलोविश्वास-अविश्वास के मनोभावों की टकराहट का नाटक है। ओथेलो डेसडेमोना से प्रेम करता है, उससे विवाह करता है लेकिन शक की वजह से उसको मार भी देता है। यों तो इस नाटक की भारत में कई प्रस्तुतियां हो चुकी हैं और विशाल भारद्वाज ने इस पर चर्चित फिल्म ओमकाराभी बनाई है लेकिन जैसा कि हर महान कृति की खूबसूरती होती है, उसकी नई व्याख्याएं होती रहती हैं और उसमें से नए नए अर्थ निकलते रहते हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी त्रिपुरारी शर्मा ने पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे साल के छात्रों के साथ नौटंकी शैली में इसे मौन एक मासूम सानाम से मंचित किया। ओथेलो और डेसडेमोना के प्रेम और अविश्वास की कहानी तो जगत विख्यात है लेकिन त्रिपुरारी शर्मा की इस प्रस्तुति की खासियत यह रही कि इस पूरे प्रकरण को एक नारीवादी नजरिए से भी दिखाया गया। आलोच्य नाटक शेक्सपीयर के नाटक ओथेलो की चारित्रिक कमजोरी पर केंद्रित है और उसके खुद के पश्चाताप और आत्मपीड़ा की भावना को भी व्यक्त करता है। लेकिन मौन एक मासूम साडेसडेमोना के दर्द का एहसास कराता है। और उसी बहाने नारी की पीड़ा रेखांकित करता है। हर कहानी अपने भीतर कई कहानियों को समेटे रहती है। अक्सर हम एक वक्त में उस कहानी को एक खास पहलू से देखते हैं लेकिन वक्त बदलने के साथ उसके दूसरे पहलू को देखने की जरूरत होती है। त्रिपुरारी शर्मा ने शेक्सपीयर की रचना को एक नए अंदाज में देखा। लेकिन यह शैली भर नहीं है। यह आज के विचार की मांग भी है। आज की तारीख में ओथेलो की भूल या उसके पश्चाताप का उतना महत्व नहीं है जितना डेसडेमोना के दर्द का है। डेसडेमोना निश्च्छल है लेकिन उसे अपनी निश्च्छलता की कीमत चुकानी पड़ती है। नौटंकी एक पारंपरिक लोकशैली है। इसमें गायन की खास भूमिका होती है। स्वाभाविक है कि मौन एक मासूम सामें भी गीतों की भरमार है। त्रिपुरारी शर्मा ने चूंकि इसे ब्रज और विशेषकर मथुरा-वृंदावन के माहौल में रूपांतरित किया है इसलिए वहां की कई परंपराएं भी इसमें आ गई। जैसे मथुरा में मल्लयुद्ध की परंपरा रही है। इसका आरंभ महाभारत काल और भगवान कृष्ण से होता है। लेकिन आज भी वह परंपरा जीवित है। दिल्ली में मास्टर चंदगीराम का अखाड़ा मथुरा के अखाड़े का ही विकास है। बहरहाल मौन एक मासूम सामें पहलवानी और मल्लयुद्ध की भी झांकी है। इसके अलावा मथुरा में डेरा नाम का एक पारंपरिक शस्त्र होता हैं, जिसमें चाकू लगे होते हैं और जिसे हाथ से घुमाकर मारा जाता है। उसका भी यहां बहुत अच्छा इस्तेमाल हुआ है। इसे एक हाथ में रखकर चरखी की तरह घुमाते हैं। इस प्रस्तुति में डेरा का भी इस्तेमाल किया गया, हालांकि उसमें चाकू नहीं थे। लेकिन इसके कलात्मक इस्तेमाल से न सिर्फ दृश्यात्मक विविधता पैदा हुई बल्कि एक लोकशास्त्र का आधुनिक रंगमंच पर आगमन भी हुआ। ब्रज लास्य की भूमि मानी जाती है। पर वीरता और पराक्रम से भी उसका रिश्ता रहा है। यह नाटक यह भी याद दिलाता है। दरअसल आधुनिकता सिर्फ नए या समकालीन से जुड़ना नहीं है बल्कि वह परंपरा का पुनराविष्कार भी है। ब्रज की कई स्थानीय परंपराओं को समेट कर त्रिपुरारी शर्मा ने एक पश्चिमी नाटक को आधुनिक भारतीय रंग भी दे दिया। उसमें रास के तत्व भी लिए और वहीं के संगीत का रस भी घोल दिया। मंच सज्जा भी बिल्कुल मथुरा और वृंदांवन के इलाके में बने मकानों से ली गई थी। वृंदावन के निधिवन के बारे में लोकमान्यता है कि वहां रात में कृष्ण राधा से मिलने आते हैं और प्रात: राधा की चूडियां बिखरी मिलती है। नाटक में इस लोकविश्वास की भी बड़ा सृजनात्मक इस्तेमाल हुआ है।


Wednesday, February 2, 2011

अंजलि इला मेनन की कला-चिंता


समकालीन भारतीय चित्रकला में अंजलि इला मेनन को विशिष्ट जगह हासिल है। पिछले हफ्ते ललित कला अकादमी के परिसर मेंकलाकार से मिलिएकार्यक्रम में रूपिका चावला के साथ बात करते हुए उन्होंने सिर्फ अपनी कलायात्रा के विभिन्न पड़ावों के बारे में बताया, बल्कि कुछ ऐसी बातें भी बतायीं जो आज की कला के सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़ी हैं। अक्सर सवाल उठता है कि आज की कला जब बाजार के जबर्दस्त दबाव में है और सिर्फ कला गैलरियां और संग्राहक ही आधुनिक कला को नियंत्रित कर रहे हैं तो ऐसे में क्या कला और कलाकार की समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बची है? आखिर जब किसी कलाकार की बनाई कलाकृतियां गैलरियों की ही शोभा बढ़ाती रहेंगी तो आम लोग उन्हें कैसे देखेंगे? जैसे-जैसे आधुनिक कला का व्यापार बढ़ रहा है और भारतीय कलाकार भी करोड़ों में बिक रहे हैं तो सामान्य जन की पहुंच कला तक कैसे होगी? आम क्या, जब खास लोग भी कलाकृति खरीदने की ताकत नहीं रखते तो फिर पेंटिग जैसी कला को जनसाधारण से कैसे जोड़ा जाएगा? अंजलि इला मेनन का कहना है कि वे खुद चाहती हैं कि सामान्य आदमी तक अपनी कला पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि म्यूरल जैसी कला को ज्यादा तवज्जो दें और इसके लिए वह निशुल्क काम करने को तैयार हैं लेकिन मुश्किल यह है कि सरकार या सार्वजनिक सरकारी उपक्रमों को इसके लिए जो उत्साह और तप्तरता दिखानी चाहिए, वो नहीं दिखायी जाती है। एक बार उन्होंने विज्ञान भवन की एक बड़ी दीवार पर म्यूरल बनाने के लिए सरकार के सामने प्रस्ताव रखा और कहा कि मैं इसके लिए कोई फीस नहीं लूंगी। कुल खर्चा लगभग दो-तीन लाख का बन रहा था। इतना सुनने के बाद बैठक में शामिल एक इंजीनियर ने कहा कि अगर इतना कम खर्चा है तो दो तीन साल के बाद उस म्यूरल को हटाकर कोई दूसरा म्यूरल भी बनाया जा सकता है! यानी अनेक सरकारी अधिकारी इस बात को समझते ही नहीं कि म्यूरल जैसी कला का क्या महत्व है। उनके लिए म्यूरल का वही महत्व है जैसी दीवार की रंगाई-पुताई का होता है। जैसे आप हर दो-तीन साल पर दीवार की सफेदी कराते हैं उसी तरह हर दो तीन साल पर नए म्यूरल बनवा सकते हैं ! अगर कला के बारे में इस तरह का दृष्टिकोण रहेगा तो सार्वजनिक स्थलों पर आधुनिक कला को प्रश्रय कैसे मिलेगा? अंजलि इला मेनन ने कोलकोता मेट्रो के लिए फाइवर ग्लास का एक म्यूरल बनाया है जो काफी चर्चित रहा है। हालांकि इस म्यूरल को भी मेट्रो रेल के अधिकारियों की नामसमझी का शिकार होना पड़ा पर यह अलग कहानी है। मूल बात यह है कि सरकार और सरकारी अधिकारी खुद कला को लेकर संवेदनशील नहीं हैं और इसी कारण कलाकारों का समुदाय अपनी प्रतिभा का सामाजिक इस्तेमाल नहीं कर पाता है। भारतीय तंत्र और कला के बीच के बीच आधुनिक समय में जो खाई बनी, वह लगातार और गहराती जा रही है। आकस्मिक नहीं कि शहरों के योजनाकार और प्रशासक सिर्फ कंक्रीट के जंगल बनाने पर जोर देते हैं। भारत के गांवों में पहले जो मकान बनते थे, उनमें काफी चित्रकारी होती थी। लेकिन वहां भी अब जिस तरह के मकान बन रहें हैं, उनमें चित्रकारी गायब हो रही है। आदिवासी समाज में उसकी झलक जरूर दिख जाती है लेकिन बाकी लोग अपने लिए जिस तरह के आवास निर्मिंत कर रहे हैं, अपने लिए जिन सामुदायिक जगहों का निर्माण कर रहे हैं, उनमें पारंपरिक कला को जगह दी जा रही है आधुनिक कला को। जब कला का सामाजिक आधार नहीं बचेगा तो साफ है कि वह गैलरियों और करोड़पति संग्राहकों के नियंतण्रमें चली जाएगी।