हिंदी के कई अभाव हैं। इनमें एक अभाव स्तरीय कला-पत्रिकाओं का न होना भी है। पेंटिंग, मूर्तिशिल्प या इंस्टालेशन जैसी दूसरी चाक्षुष कलाओं में भारत की काफी सक्रियताएं है। नई सोच है। लेकिन उनके बारे में अगर आप हिंदी माध्यम से जानना चाहें तो कुछ कदम चलने के साथ रुक जाना पड़ेगा। फिलहाल सिर्फ चाक्षुष कलाओं की बात करें तो यह दुनिया भी कई तरह के प्रयोगों, हलचलों, बहसों और बैचेनियों से भरी पड़ी है। इन सबके बारे में जानने और इनमें कुछ जोड़ने के लिए भी कई पत्रिकाओं की जरूरत है। निस्संदेह चाक्षुष कला दृश्यों के माध्यम से सोचती है पर उस सोच को दूसरे तक पहुंचाने के लिए शब्दों की आवश्यकता भी पड़ती है। पत्रिकाएं सोच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती हैं। यह खुशी की बात है कि कला-प्रशासक और समीक्षक विनय कुमार और उनके कुछ मित्रों ने ‘कैनवास’ नाम से नई पत्रिका निकाली है। इसका प्रवेशांक ही न्यू मीडिया पर केंद्रित है। न्यू मीडिया से तात्पर्य डिजिटल मीडिया से है। डिजिटल मीडिया ने चाक्षुष कलाओं की दुनिया में बड़ा बदलाव किया है और यह प्रकिया जारी है। यह कलाओं में उत्तर आधुनिकता की प्रक्रिया है। प्रवेशांक में इसी प्रक्रिया को देखने-समझने की कोशिश है। इसमें वरिष्ठ कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल के अलावा अवधेश मिश्र, संध्या बोर्डवेकर, पण्रामिता बोरगेहेन, मनोज कुलकर्णी, वंदना सिंह और ज्योतिष जोशी सहित अनेक लेखकों की रचनाएं शामिल हैं। प्रवेशांक का जोर ‘न्यू मीडिया’ पर है, अत: उसके बारे में सामग्री ज्यादा है पर कला संबंधी दूसरे पक्षों को रेखांकित करनेवाले आलेख भी इसमें हैं। जिसे ‘न्यू मीडिया कहते हैं, यानी डिजिटल टेक्नोलॉजी या कंप्यूटर के सहयोग और उपयोग से निर्मिंत कला, वह अब भी भारतीय कला जगत में संदेहास्पद स्थिति में है। पेंटिग की पारंपरिक शैली के बारे में कइयों को लगता है कि वह कला और कलाकार की निश्च्छलता से बनती है और डिजिटल कला के बारे में बहुतों का सोचना है कि उस पर बाजार का दबाव रहता है। पत्रिका के शामिल लेखों में भी इस तरह का संशय है। अपने लेख ‘कला, कला का समय और रचनात्मक मूल्य’ में राजेश कुमार व्यास न्यू मीडिया को लेकर इसी तरह का संशय प्रस्तुत करते हैं। पर अनिरुद्ध चारी बताते हैं कि डिजिटल कला के भीतर कलाओं को लोकतांत्रिक करने की क्षमता है। यानी ज्यादा से ज्यादा लोग कलाकार बन सकते हैं। वीडियो और फोटोग्राफी जैसी प्रविधियों और इंस्टालेशन जैसी शैलियों ने कला और कलाकारों के लिए दृष्टि और अवसर ही नहीं, नई कल्पनाशीलता भी पैदा की है। इनकी वजह से कला की व्यापकता बढ़ी है। लेकिन क्या व्यापकता बढ़ने के साथ-साथ कला की गुणवत्ता का भी प्रसार होता है? इस प्रश्न को भी कुछ लेखों में उठाया गया है। अन्य लेखों में भारत में न्यू मीडिया के आगमन और उसके समय के साथ विस्तार के क्रमिक विकास को भी दिखाया गया है। प्रयाग शुक्ल ने अपने लेख में चिंता जताई है कि आजकल कई अधकचरी चीजों को भी कला के नाम पर परोसा जा रहा है। यह भी एक खतरनाक स्थिति है और साथ ही कला विरोधी भी। हिंदी में अभी जो थोड़ी बहुत कला पत्रिकाएं निकल रही हैं, उनकी कमजोरी यह भी है कि उनमें कलाकृतियों के फोटोग्राफ कम होते हैं, या नहीं के बराबर। सौभाग्य से ‘कैनवास’ में यह स्थिति नहीं है। इसमें कई कलाकृतियों और कलाकारों के अच्छे फोटोग्राफ हैं। भारत से कई शहरों और स्थानों में जो कला-गतिविधियां चल रही हैं उनके बारे में रिपोर्ट भी यहां हैं। ‘कैनवास’ ने अच्छी संभावना जगाई है।
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