Monday, April 25, 2011

विश्व बाजार में पिछड़ती भारतीय कला


अंतरराष्ट्रीय कला बाजार से जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक चीनी कला की मांग बड़ी तेजी से बढ़ रही है। यूरोप पिछड़ रहा है और भारत की तो कोई गिनती ही नहीं है। सबसे ताजा आंकड़ा यह है कि अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में चीनी कला का शेयर पहले स्थान पर है यानी 34 प्रतिशत। अमेरिका भी चीन से पीछे है जो 30 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है। चीनी कला का व्यापार 2010 में तीन अरब डॉलर से ज्यादा का रहा तो अमेरिका का दो अरब अस्सी करोड़ डॉलर का। इसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस का स्थान है। इस हिसाब से देखें तो भारतीय कला की हालत बहुत पतली है। दुनिया के चोटी के छह कलाकारों में तीन चीनी हैं और दुनिया के सौ शीर्षस्थ कलाकारों में एक भी भारतीय नहीं है। हां दुनिया के 500 कलाकारों की सूची में कुछ भारतीय जरूर हैं। मकबूल फिदा हुसैन का स्थान 136 वां है। मकबूल फिदा हुसैन (हालांकि वे अब भारतीय नहीं रहे), सुबोध गुप्ता, भारती खेर और अर्पिता सिंह जैसे कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो दुनिया के कला बाजार में भारतीय कलाकारों को ज्यादा कीमत नहीं मिल रही है जबकि कई चीनी कलाकारों की कृतियां ज्यादा महंगे दामों पर बिक रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के नियामकों और योजनाकारों के लिए कला की कोई खास हैसियत नहीं है। बेशक सूजा या रजा जैसे कुछ भारतीय कलाकारों ने अपनी मेधा और परिश्रम से भारतीय कला को विश्व स्तर पर पहुंचाया लेकिन सरकारी नीतियां कला और कला बाजार को लेकर उत्साहहीन रही हैं। अगर दुनिया में चीनी कला और कलात्मक वस्तुओं (बर्तन आदि) की मांग बढ़ रही है तो उसके पीछे चीनी सरकार की अपनी योजनाएं भी रही हैं। यह ठीक है कि चीन में कई कलाकारों को राजनैतिक दमन से भी गुजरना पड़ा लेकिन वहां की सरकार ने अपने यहां 'कला जिला' बनाकर कला को आर्थिक आकांक्षाओं से भी जोड़ा। हालांकि कुछ कला संस्थान हमारे यहां भी बने लेकिन वे अर्थव्यवस्था के साथ कदमताल नहीं कर पाए। समकालीन कला के सर्जनात्मक आयाम को विकसित करने के लिए ललित कला अकादेमी बनी लेकिन वह कलाकारों की समकालीन राजनीति में इतनी बुरी तरह फंसी कि वहां से निकल नहीं पा रही है। विश्व की कला संस्थाओं में उसकी कोई जगह नहीं है। यह अकादेमी पिछले छह सालों से अंतरराष्ट्रीय कला त्रैवार्षिकी का आयोजन करने में असमर्थ रही है। अगर यही जारी रहा तो फिर भारतीय कला विश्व स्तर या विश्व बाजार में कैसे पहुंचेगी। पिछले दिनों ललित कला अकादेमी ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक प्रेस कांफ्रेस कर इस बात पर अपनी ही पीठ ठोकी वह 'वेनिस द्वैवार्षिकी' में शिरकत करने जा रही है। लेकिन अकादमी के पदाधिकारियों के पास इस बात का जवाब नहीं था कि वे खुद इस तरह के अंतरराष्ट्रीय कला आयोजन नहीं कर पाते। इस अयोग्यता का क्या कारण है? यह तो समकालीन कला से जुड़ी स्थिति है। पारंपरिक भारतीय कलाओं के संवर्धन और विकास के लिए तो भारत में कोई संस्थान ही नहीं है। जबकि चीनी सरकर अपनी पारंपरिक कलाओं पर खास ध्यान देती हैं। चीनी बर्तनों की मांग हर देश में बढ़ रही है। चीनी जलरंग तो भारत के ड्राइंग रूम तक की शोभा बढ़ा रहे हैं। कला समीक्षकों की दृष्टि भी पारंपरिक भारतीय चित्रकारी और कलाकारी पर नहीं जाती। हालांकि भारतीय पारंपरिक कलाओं में भी कई तरह की विविधता और विशिष्टताएं हैं लेकिन कला को लेकर कोई योजनाबद्ध दृष्टि न रहने से भारतीय घरों और ड्राइंग रूम में भी पारंपरिक कलाओं को कोई खास जगह नहीं मिलती।

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