Sunday, April 10, 2011

विविध कलाकारों का संगम स्थल


देश में आयोजित होने वाले प्रमुख संगीत आयोजनों के बीच इंडो ओक्सिडेन्टल सिमबियोसिस संगीत समारोह अपनी खास पहचान बना चुका है। कोलकाता के इस संगठन ने राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नेशनल फेस्टिवल ऑफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक एंड डांस के नाम से समारोह करवाने में नया कीर्तिमान स्थापित किया है। पिछले पांच सालों से हो रहे इस महोत्सव में देश के अनगिनत प्रखर और नये प्रतिभाशाली कलाकारों की आवाजाही हो रही है। हाल ही में यह समारोह दिल्ली में आयोजित किया गया। नई दिल्ली के कमानी सभागार में पांच दिन तक होने वाला यह महोत्सव संगीत के शिखर पुरुष पंडित भीमसेन जोशी को समर्पित था। इसमें संगीत और नृत्य के लगभग 21 कलाकार शामिल थे। गायन-वादन में प्रमुख कलाकार उस्ताद रशीद खां, पंडित अजय चक्रवर्ती, राजा-राधा रेड्डी मालविका साराभाई सुभद्रा गुहा, पंडित कुमार बोस, वैजंतीमाला, बेगम परवीन सुल्ताना, पूर्वायन चटर्जी और राजन-साजन मिश्र थे। उनके अलावा शहनाई में राजेन्द्र प्रसन्ना, सरोद में अयान अली खां, पंडित देबोज्योति बोस, तबला सोलो में उस्ताद हशमत अली अकरम खां, गायन में रितेश-रजनीश मिश्र, पारसारथी देशिकन, नृत्य में दीपक महाराज, विशाल कृष्ण, वास्वती-राम मोहन मिश्र, मालविका सेन और दुर्गा आर्य थीं। मंगलाचरण के रूप में समारोह का उद्घाटन राजेन्द्र प्रसन्ना के शहनाई वादन से हुआ। खयाल अंग की रागदारी और बनारस की पूरब अंग गायिकी का रस उनके वादन में बखूबी उभरा। मंगल प्रसाद के दुक्कड़ की संगत पर सुर और लय का अच्छा तानाबाना उनके वादन में था। कथक में पंडित बिरजू महाराज के पुत्र दीपक महाराज के नृत्य में अपने पिता की शैली और अनूठे अंदाज की पूरी झलक दिखती है। बहन स्थिता मिश्रा के साथ युगल नृत्य में अर्धनारीश्वर और तेरह मात्रा व तीनताल पर नृत्य करने में दीपक ने खूब समां बांधा। खयाल के मशहूर गायक उस्ताद रशीद खां द्वारा राग जोग और सोहिनी की प्रस्तुति में शुद्ध रागदारी और बंदिश की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने श्रोताओं को रसमग्न किया। उस्ताद अमजद अली खां के बेटे अयान अली द्वारा राग श्री की आलाप, जोड़ और गत को पेश करने के चलन में गमक मींड ताने, स्वराभिव्यंजना और लयकारी में अच्छी तराश नजर आई। उनके वादन को चार चांद लगाने में आनंदो-चटर्जी की तबला संगत बेजोड़ थी। पंडित अजय चक्रवर्ती ने भी ऊर्जा भरे खुले स्वर में राज शुद्ध कल्याण को रसपूर्णता से प्रस्तुत किया। पंडित राजन मिश्र के पुत्र राजेश-रजनीश की जोड़ी गायन के फलक पर तेजी से उभरी है। योगेश सम्सी के ओजपूर्ण तबला संगीत पर उन्होंने राग श्याम कल्याण से गायन की शुरुआत सुगमता और सरसता से की। विलंबित की बंदिश-'जियो मोरे लाल', मध्य तीनताल पर उन संग लागी लगन और द्रुत एकताल की बंदिश को उन्होंने खनकती और मधुर स्वर में पेश करने में रागदारी के रंग दिखाए। सरगम, तानों की निकास, मींड से लेकर विविधतापूर्ण लय के कई चलन उन्होंने खूबसूरती से पेश किये। आखिर में भजन 'हे गोविंद राखो शरण' की प्रस्तुति कर्णप्रिय थी। कोलकाता के देबोज्योति बोस ने सरोद पर राग कलावती को शुद्धता और सुरीले अंदाज में पेश किया। खमाज थाट के इस राग को बजाने में मीड और आंदोलन स्वर का लगाव बहुत आकर्षक था। आनंदो के प्रभावी तबला संगत पर उन्होंने लयकारी का भी चमत्कार दिखाया। शुभ्रा गुहा के गायन द्वारा पूरब अंग गायिकी में ठुमरी, चैती, काफी और दादरा में निबद्ध बंदिशों की प्रस्तुति स्वर और भाव में पूरी तरह सनी थीं। तबला के विख्यात वादक पंडित कुमार बोस ने एकल तबला वादन में अपनी बेजोड़ कला के दर्शन करवाये। तीनताल पर कायदा, पेशकार, गतें, परबा से लेकर लयकारी में अपनी थिरकती उंगलियों का कमाल वास्तव में अद्भुत था। पचासी साल की दहलीज पर पहुंच गई वैजंतीकाला आज भी भरतनाटय़म नृत्य की ऊर्जावान नृत्यांगना हैं। नृत्य के लिहाज से उनका शरीर अभी भी सुडौल और गठित है और चेहरे की भाव भंगिमाओ में पुरानी तराश बरकरार है। उन्होंने बाल्मीकि में रामायण से उद्द्धृत कई प्रसंगों को नृत्य और अभिनय में बड़ी उदात्तता से प्रस्तुत करके दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। नृत्य में उनका अडुव, अंग, पद संचालन और मुद्राओं की खूबसूरती बेहद रोमांचकारी थी। समापन के दिन कार्यक्रम दिन के 11 बजे से रात के 11 बजे तक चलता रहा। इसमें विदुषी प्रवीन सुल्ताना का गायन, राजा राधा रेड्डी का कुचिपुड़ी नृत्य, पूर्वायन चटर्जी का सितार वादन और राजन-साजन मिश्र का गायन कलानुरागियों को रिझाने में खास था। वास्वती मिश्रा और राममोहन महाराज का कथक में युगल नृत्य, मालविका सेन का भरतनाटय़म, पारसारथी देशिकन का खयाल गायन और दुर्गा आर्य का कथक नृत्य भी दर्शकों को लुभाने वाला दिखा।

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