कभी मुलतान शहर के नाम से प्रसिद्ध रहे सलमेड़ी से दो किलोमीटर दूर बेली गांव के भू-गर्भ में अमूल्य धरोहर का स्वर्ग छिपा है। गांव में नवपाषण, हड़प्पा, कुषाण, मौर्य व गुप्तकाल से मिलती-जुलती सभ्यता के प्रमाण मिले हैं, लेकिन संरक्षण के अभाव में यह बर्बादी की ओर अग्रसर है। अवशेष देखकर लगता है कि यहां पर मिट्टी के बर्तन, हथियार, उपकरण व अन्य कलाकृतियों का कारोबार होता था। बेली गांव महत्वपूर्ण व्यावसायिक केंद्र व संपन्न शहर रहा होगा। ऊधमपुर शहर से 12 किमी. दूर प्रसिद्ध क्रिमची मंदिर को संरक्षित करने के लिए तो कदम उठा लिए गए, लेकिन बाकी जगह कोई प्रयास नहीं हुआ। बेली व इसके साथ लगते लांसी व डबरेह गांव में चार सौ कनाल भूमि पर बर्तन, खिलौने, उपकरण, सिक्के व जीर्ण-शीर्ण मंदिर मौजूद हैं। बेली गांव में स्थित एक एतिहासिक महत्व वाला मंदिर मिट्टी के टिल्ले पर स्थित है जिसका मुख पूर्व की ओर है। इसका दरवाजा पत्थर के स्लैब का बना हुआ है, लेकिन रखरखाव के अभाव में यह खंडहर बन रहा है। ग्रामीण इस मंदिर के पत्थर निकालकर ले जा रहे हैं। आठवीं व नौवीं शताब्दी में इसी तरह के बने मंदिर कई स्थानों पर स्थित हैं। मंदिर से एक किमी. दूर स्थित बावली में पत्थर की बनी गणेश व नाग देवता की मूर्ति है। इन गांवों में लाल, काली व भूरी मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा के बर्तन, पत्थर व लोहे के बर्तन, हथियार व हथियार बनाने के लिए प्रयोग किया जाना वाला पत्थर का धारदार उपकरण, तांबा व चांदी के सिक्के और अन्य कलाकृतियां तथा खिलौने मिले हैं। जिले के इतिहास, धरोहर व संस्कृति पर काम करने वाले अनिल पाबा का कहना है कि क्ति्रमची मंदिर कन्नौज से कश्मीर का पुराना मार्ग है। इसका वर्णन अलबरुनी ने भी किया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में उन्हें जानकारी मिली थी कि बेली गांव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में एक प्राचीन मंदिर है, जिसे देखने के लिए वह जब वहां गए तो उन्हें मिट्टी के कई बर्तन मिले। यहां से प्राप्त बर्तन, हथियार, माप-तौल में प्रयोग किए जाने वाले पत्थर व अन्य कलाकृति, आयरन स्लैग, बालों में लगाने वाले पिन से यह पता चलता है कि यह गांव प्राचीन काल में एक अहम व्यावसायिक केंद्र व संपन्न शहर रहा होगा। उन्होंने बताया कि वे जम्मू यूनिवर्सिटी के साथ-साथ भोपाल विवि, कलकता विवि, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला, गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर सहित कई स्थानों पर सेमिनार व प्रदर्शनी के माध्यम से बेली गांव के रहस्य को उजागर कर चुके हैं। इसके बावजूद पुरातत्व विभाग की ओर से इसे बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। इस बारे में बात करने पर आर्कियोलॉजी, आर्काइक एवं म्यूजियम विभाग के डिप्टी डायरेक्टर पीरजादा मोहम्मद अशरफ के अनुसार शीघ्र ही एक टीम बेली गांव में जाकर स्थिति का जायजा लेगी। उनके अनुसार स्टेट प्रोटेक्टेड साइट के लिए कुछ नियम हैं यदि उस पर यह इलाका खरा उतरेगा तो इसके लिए कार्रवाई की जाएगी।
Friday, March 25, 2011
Monday, March 7, 2011
Friday, March 4, 2011
डिसेबल्ड फ्रेंडली होंगे स्मारक
स्मारकों और संग्राहलयों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों का बनाने की दिशा में उन्हें डिसेबल्ड फ्रेंडली बनाया जाएगा। इसके तहत सबसे पहले दिल्ली के स्मारकों और संग्राहलयों को नेत्रहीनों के लिए सुगम बनाने के प्रयास किए जाएंगे। हालांकि अभी सांची के स्तूप और सारनाथ संग्राहलय डिसेबल्ड फ्रेंडली हैं लेकिन अब देश भर के सभी मुख्य स्मारकों को विकलांगों के लिए सुगम बनाने की कवाद शुरू की जाएगी। मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस द्वारा इस प्रोजेक्ट को फंड मुहैय्या कराने की भी संभावना है। भारतीय पुरातत्व सव्रेक्षण (एएसआई) दिल्ली के स्मारकों को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पेश करने की तैयारी कर रहा है। इसके तहत स्मारकों और संग्राहलयों में ब्रेल लिप में बोर्ड, स्पर्शनीय मानचित्र, ऑडियो गाइड ऐसे काम हैं जो स्मारकों में किए जाएंगे। स्मारकों को नेत्रहीनों के लिए ब्रेल लिपि के बोर्ड लगाए जाएंगे। साथ ही ब्रेल लिपि में उनके लिए गाइड मैप भी होगा ताकि वे समझ सकें कि कहां क्या है। इसके लिए एएसआई देश भर के विभिन्न सर्कल्स में कार्य शुरू करेगा लेकिन सबसे पहले यह काम दिल्ली में शुरू किया जाएगा। दिल्ली में लाल किला, हुमायूं का मकबरा, कुतुबमीनार, सफदरजंग का मकबरा और पुराना किला ऐसे स्मारक हैं जहां से इस योजना को शुरू किया जा सकता है। इस काम में एएसआई देहरादून के नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ विजुअली हेंडीकेप्ड की भी मदद लेगा। साइनेज व बोर्ड बनाने में संस्थान की मदद ली जाएगी। साथ ही विशेषज्ञों की भी राय ली जाएगी ताकि स्मारकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जा सके। साथ ही नक्शे और एग्जीबिटर स्पर्शनीय लगाए जाएंगे। प्रमुख स्मारकों में ऑडियो गाइड की सुविधा भी इस दिशा में एक अहम कदम होगा। इससे नेत्रहीनों के लिए स्मारक और संग्राहलय घूमना और उनके विषय में जानकारी प्राप्त करना बेहद आसान हो जाएगा। ऐसा होने से विदेशों के नेत्रहीन पर्यटक भी इसका भरपूर लाभ उठा सकेंगे और विदेशों में संदेश जाएगा कि भारत के संग्राहलय और स्मारक डिसेबल्ड फ्रेंडली हैं। साथ ही पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। एएसआई के आला अधिकारियों का मानना है कि इस कार्य के लिए फंड कोई मुद्दा नहीं है। मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस इस प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता देने के लिए दिलचस्पी दिखा चुका है। यदि इस प्रोजेक्ट को दिल्ली में कामयाबी मिल जाती है तो इसे देश के अन्य प्रमुख स्मारकों में भी शुरू किया जाएगा।
Sunday, February 20, 2011
‘ओथेलो ’ की ब्रजमयी प्रस्तुति
शेक्सपीयर का मशहूर नाटक ‘ओथेलो’ विश्वास-अविश्वास के मनोभावों की टकराहट का नाटक है। ओथेलो डेसडेमोना से प्रेम करता है, उससे विवाह करता है लेकिन शक की वजह से उसको मार भी देता है। यों तो इस नाटक की भारत में कई प्रस्तुतियां हो चुकी हैं और विशाल भारद्वाज ने इस पर चर्चित फिल्म ओमकारा’ भी बनाई है लेकिन जैसा कि हर महान कृति की खूबसूरती होती है, उसकी नई व्याख्याएं होती रहती हैं और उसमें से नए नए अर्थ निकलते रहते हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी त्रिपुरारी शर्मा ने पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे साल के छात्रों के साथ नौटंकी शैली में इसे ‘मौन एक मासूम सा’ नाम से मंचित किया। ओथेलो और डेसडेमोना के प्रेम और अविश्वास की कहानी तो जगत विख्यात है लेकिन त्रिपुरारी शर्मा की इस प्रस्तुति की खासियत यह रही कि इस पूरे प्रकरण को एक नारीवादी नजरिए से भी दिखाया गया। आलोच्य नाटक शेक्सपीयर के नाटक ओथेलो की चारित्रिक कमजोरी पर केंद्रित है और उसके खुद के पश्चाताप और आत्मपीड़ा की भावना को भी व्यक्त करता है। लेकिन ‘मौन एक मासूम सा’ डेसडेमोना के दर्द का एहसास कराता है। और उसी बहाने नारी की पीड़ा रेखांकित करता है। हर कहानी अपने भीतर कई कहानियों को समेटे रहती है। अक्सर हम एक वक्त में उस कहानी को एक खास पहलू से देखते हैं लेकिन वक्त बदलने के साथ उसके दूसरे पहलू को देखने की जरूरत होती है। त्रिपुरारी शर्मा ने शेक्सपीयर की रचना को एक नए अंदाज में देखा। लेकिन यह शैली भर नहीं है। यह आज के विचार की मांग भी है। आज की तारीख में ओथेलो की भूल या उसके पश्चाताप का उतना महत्व नहीं है जितना डेसडेमोना के दर्द का है। डेसडेमोना निश्च्छल है लेकिन उसे अपनी निश्च्छलता की कीमत चुकानी पड़ती है। नौटंकी एक पारंपरिक लोकशैली है। इसमें गायन की खास भूमिका होती है। स्वाभाविक है कि ‘मौन एक मासूम सा’ में भी गीतों की भरमार है। त्रिपुरारी शर्मा ने चूंकि इसे ब्रज और विशेषकर मथुरा-वृंदावन के माहौल में रूपांतरित किया है इसलिए वहां की कई परंपराएं भी इसमें आ गई। जैसे मथुरा में मल्लयुद्ध की परंपरा रही है। इसका आरंभ महाभारत काल और भगवान कृष्ण से होता है। लेकिन आज भी वह परंपरा जीवित है। दिल्ली में मास्टर चंदगीराम का अखाड़ा मथुरा के अखाड़े का ही विकास है। बहरहाल ‘मौन एक मासूम सा’ में पहलवानी और मल्लयुद्ध की भी झांकी है। इसके अलावा मथुरा में डेरा नाम का एक पारंपरिक शस्त्र होता हैं, जिसमें चाकू लगे होते हैं और जिसे हाथ से घुमाकर मारा जाता है। उसका भी यहां बहुत अच्छा इस्तेमाल हुआ है। इसे एक हाथ में रखकर चरखी की तरह घुमाते हैं। इस प्रस्तुति में डेरा का भी इस्तेमाल किया गया, हालांकि उसमें चाकू नहीं थे। लेकिन इसके कलात्मक इस्तेमाल से न सिर्फ दृश्यात्मक विविधता पैदा हुई बल्कि एक लोकशास्त्र का आधुनिक रंगमंच पर आगमन भी हुआ। ब्रज लास्य की भूमि मानी जाती है। पर वीरता और पराक्रम से भी उसका रिश्ता रहा है। यह नाटक यह भी याद दिलाता है। दरअसल आधुनिकता सिर्फ नए या समकालीन से जुड़ना नहीं है बल्कि वह परंपरा का पुनराविष्कार भी है। ब्रज की कई स्थानीय परंपराओं को समेट कर त्रिपुरारी शर्मा ने एक पश्चिमी नाटक को आधुनिक भारतीय रंग भी दे दिया। उसमें रास के तत्व भी लिए और वहीं के संगीत का रस भी घोल दिया। मंच सज्जा भी बिल्कुल मथुरा और वृंदांवन के इलाके में बने मकानों से ली गई थी। वृंदावन के निधिवन ’ के बारे में लोकमान्यता है कि वहां रात में कृष्ण राधा से मिलने आते हैं और प्रात: राधा की चूडियां बिखरी मिलती है। नाटक में इस लोकविश्वास की भी बड़ा सृजनात्मक इस्तेमाल हुआ है।
Wednesday, February 2, 2011
अंजलि इला मेनन की कला-चिंता
समकालीन भारतीय चित्रकला में अंजलि इला मेनन को विशिष्ट जगह हासिल है। पिछले हफ्ते ललित कला अकादमी के परिसर में ‘कलाकार से मिलिए’ कार्यक्रम में रूपिका चावला के साथ बात करते हुए उन्होंने न सिर्फ अपनी कलायात्रा के विभिन्न पड़ावों के बारे में बताया, बल्कि कुछ ऐसी बातें भी बतायीं जो आज की कला के सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़ी हैं। अक्सर सवाल उठता है कि आज की कला जब बाजार के जबर्दस्त दबाव में है और सिर्फ कला गैलरियां और संग्राहक ही आधुनिक कला को नियंत्रित कर रहे हैं तो ऐसे में क्या कला और कलाकार की समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बची है? आखिर जब किसी कलाकार की बनाई कलाकृतियां गैलरियों की ही शोभा बढ़ाती रहेंगी तो आम लोग उन्हें कैसे देखेंगे? जैसे-जैसे आधुनिक कला का व्यापार बढ़ रहा है और भारतीय कलाकार भी करोड़ों में बिक रहे हैं तो सामान्य जन की पहुंच कला तक कैसे होगी? आम क्या, जब खास लोग भी कलाकृति खरीदने की ताकत नहीं रखते तो फिर पेंटिग जैसी कला को जनसाधारण से कैसे जोड़ा जाएगा? अंजलि इला मेनन का कहना है कि वे खुद चाहती हैं कि सामान्य आदमी तक अपनी कला पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि म्यूरल जैसी कला को ज्यादा तवज्जो दें और इसके लिए वह निशुल्क काम करने को तैयार हैं लेकिन मुश्किल यह है कि सरकार या सार्वजनिक सरकारी उपक्रमों को इसके लिए जो उत्साह और तप्तरता दिखानी चाहिए, वो नहीं दिखायी जाती है। एक बार उन्होंने विज्ञान भवन की एक बड़ी दीवार पर म्यूरल बनाने के लिए सरकार के सामने प्रस्ताव रखा और कहा कि मैं इसके लिए कोई फीस नहीं लूंगी। कुल खर्चा लगभग दो-तीन लाख का बन रहा था। इतना सुनने के बाद बैठक में शामिल एक इंजीनियर ने कहा कि अगर इतना कम खर्चा है तो दो तीन साल के बाद उस म्यूरल को हटाकर कोई दूसरा म्यूरल भी बनाया जा सकता है! यानी अनेक सरकारी अधिकारी इस बात को समझते ही नहीं कि म्यूरल जैसी कला का क्या महत्व है। उनके लिए म्यूरल का वही महत्व है जैसी दीवार की रंगाई-पुताई का होता है। जैसे आप हर दो-तीन साल पर दीवार की सफेदी कराते हैं उसी तरह हर दो तीन साल पर नए म्यूरल बनवा सकते हैं ! अगर कला के बारे में इस तरह का दृष्टिकोण रहेगा तो सार्वजनिक स्थलों पर आधुनिक कला को प्रश्रय कैसे मिलेगा? अंजलि इला मेनन ने कोलकोता मेट्रो के लिए फाइवर ग्लास का एक म्यूरल बनाया है जो काफी चर्चित रहा है। हालांकि इस म्यूरल को भी मेट्रो रेल के अधिकारियों की नामसमझी का शिकार होना पड़ा पर यह अलग कहानी है। मूल बात यह है कि सरकार और सरकारी अधिकारी खुद कला को लेकर संवेदनशील नहीं हैं और इसी कारण कलाकारों का समुदाय अपनी प्रतिभा का सामाजिक इस्तेमाल नहीं कर पाता है। भारतीय तंत्र और कला के बीच के बीच आधुनिक समय में जो खाई बनी, वह लगातार और गहराती जा रही है। आकस्मिक नहीं कि शहरों के योजनाकार और प्रशासक सिर्फ कंक्रीट के जंगल बनाने पर जोर देते हैं। भारत के गांवों में पहले जो मकान बनते थे, उनमें काफी चित्रकारी होती थी। लेकिन वहां भी अब जिस तरह के मकान बन रहें हैं, उनमें चित्रकारी गायब हो रही है। आदिवासी समाज में उसकी झलक जरूर दिख जाती है लेकिन बाकी लोग अपने लिए जिस तरह के आवास निर्मिंत कर रहे हैं, अपने लिए जिन सामुदायिक जगहों का निर्माण कर रहे हैं, उनमें न पारंपरिक कला को जगह दी जा रही है न आधुनिक कला को। जब कला का सामाजिक आधार नहीं बचेगा तो साफ है कि वह गैलरियों और करोड़पति संग्राहकों के नियंतण्रमें चली जाएगी।
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