Thursday, January 6, 2011
विगत से जुड़ी आगत की आहटें
कला और रंगमंच के लिहाज से देखें तो बीता और आता हुआ साल आपस में जुड़े हुए हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि कला सिर्फ कैलेंडर से नहीं चलती। उसका एक सिलसिला होता है जो कभी टूटती भी है और कभी जुड़ता भी है। 2010 में कला जगत में कई तरह के विवाद हुए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण रहा मकबूल फिदा हुसैन का भारत छोड़कर कतर का नागरिक बनना। इस पर कई सवाल उठे कि क्या उनको इस तरह भारत की नागरिकता छोड़कर कतर का नागरिक बनना चाहिए था। लेकिन प्रतिक्रियास्वरूप ये बातें भी उठीं कि छियानबे साल के जिस शख्स पर भारत में इतने मुकदमें चल रहे हों, वह क्या अपनी जिंदगी में कभी भारत लौट कर आ सकता था। खैर हुसैन कतर के नागरिक होते हुए भी भारतीय कला के बड़े नागरिक हैं और आगे भी रहेंगे। दरअसल कला की नागरिकता देश की नागरिकता से अलग होती है। आकिस्मक नहीं कि भारतीय मूल के पर इंग्लैंड के नागरिक अनीश कपूर, जिनकी प्रदर्शनी 2010 के अंत में भारत में शुरू हुई और इस साल भी कुछ हफ्ते चलेगी, भारतीय और अभारतीय दोनों हैं। हालांकि वे संवैधानिक रूप से भारतीय नहीं हैं फिर भी भारतीयता से उनको अलग नहीं किया जा सकता। बीते साल दो भारतीय कलाकारों ने विश्व मंच पर अपनी खास हैसियत बनाई। भारती खेर और अर्पिता सिंह की कलाकृतियां जिन ऊंची कीमतों पर अतंरराष्ट्रीय कला बाजार में बिकीं, उसने भारतीय कला के लिए नई संभावनाएं जगाईं। 2010 कई बड़े कलाकारों की बड़ी पुनरावलोकन प्रदर्शनियों के लिए भी याद किया जाएगा। जैसे रामचंद्रन, रामकुमार और फ्रांसिस न्यूटन सूजा। ऐसे में पूछा जा सकता है कि आनेवाला साल भारतीय कला के लिए क्या लेकर आनेवाला है। इस सिलसिले में एक बड़ी बात तो यह होनेवाली हैं कि फ्रांस में पिछले कई वष्रो से रहते आ रहे वरिष्ठ भारतीय कलाकार रजा अब 2011 से भारत में ही रहने आ रहे हैं। 2010 में उनके कामों की एक प्रदर्शनी भी दिल्ली के फ्रांसीसी दूतावास में लगी। लेकिन आशा करनी चाहिए कि जब रजा भारत में ही स्थायी रूप से रहने का फैसला कर चुके हैं तो 2011 में उनके नए कामों की प्रद्रर्शनी इनके अपने देश में देखने को मिलेगी। 2010 हुसैन के जाने के लिए याद रखा जाएगा तो 2011 रजा के आने के लिए। वैसे रजा इस साल जनवरी के पहले हफ्ते में ही तेजी ग्रोवर की पेंटिग की प्रदर्शनी का उद्घाटन करने वाले हैं। तेजी हिंदी की कवयित्री हैं और पेंटिग भी करती हैं। उन्होंने हिंदी के कवि शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं से प्रेरित होकर ये कलाकृतियां बनाई हैं। वैसे तो हर साल की तरह इस साल भी कई प्रकार की कला प्रदर्शनियां होंगी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण होगी अंतरराष्ट्रीय कला त्रैवार्षिकी- जिसे इस बार दिल्ली में आयोजित किया जाना है। इसके अलावा दिल्ली में राष्ट्रीय कला मेला भी होगा। लेकिन दोनों ही आयोजन होने के पहले देखना होगा कि ललित कला अकादमी में क्या होगा। दोनों आयोजन ललित कला अकादेमी करती है पर आजकल वहां जिस तरह की मुकदमेबाजी का दौर चल रहा है उससे कई तरह की अनिश्चितताएं भी पैदा हो गई हैं। ललित कला अकादेमी किस दिशा में आगे बढ़ती है, यह भी भारतीय कला के लिए एक दिशा संकेत की तरह होगा। यह भी देखनेवाली बात होगी कि 2011 में कला बाजार किस तरह से काम करता है। यह ठीक है कि सुबोध गुप्ता, भारती खेर या अर्पिता सिंह की कलाकृतियों की अंतरराष्ट्रीय जगत में मांग है लेकिन भारतीय कलाबाजार तीन-चार सालों से जिस मंदी की मार झेल रहा है, उससे उबरने के आसार नहीं दिख रहे हैं। इसका असर कलाकारों पर पड़ा है और उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि अपने आपको कैसे बचाए रखें। जब तक देश का आंतरिक कला बाजार नहीं संभलता है भारतीय कलाकार और कला की स्थिति सुदृढ़ नहीं होगी। अब तो यह एक रिवाज सा बन गया है कि भारतीय रंगमंच हर साल उत्सव की तरह शुरू होता है। इसका कारण है भारत रंग महोत्सव जो हर साल जनवरी के पहले हफ्ते से आयोजित होता है। इसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आयोजित करता है। 2010 के भारत रंग महोत्सव में भी अच्छे नाटक देखने को मिले थे। इस बार भी कई बेहतर नाटक आ रहे हैं। युवा रंर्गकमी मानव कौल का हिंदी नाटक ‘पार्क’, र्धमवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ का नाट्य रूपांतरण, त्रिशला पटेल का ‘कुंभ कथा’ जैसे कुछ नाटकों के अलावा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के नाटक भी देखने के मिलेंगे। इसके अलावा इस बार चिली, फ्रांस, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, पोलैंड, नेपाल, अल्बानिया, बांग्लादेश जैसे देशों के नाटक भी आ रहे हैं। भारत रंग महोत्सव सात से 22 जनवरी तक दिल्ली में चलेगा। इसका एक हिस्सा चैन्नई में भी होगा। महोत्सव के पहले ही दिन ‘चरणदास चोर’ का मंचन होगा लेकिन असिमया में। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी में इस नाटक को करके इसको पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया था। देखते हैं कि असिमया में यह कैसी छाप छोड़ता है। पिछले साल यानी 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के समय भानु भारती के निर्देशन में ‘अंधायुग’ को बड़े स्तर पर मंचित किया जाना था पर कुछ तकनीकी वजहों यह नाटक उस समय मंचित नहीं हो सका। अब यह फरवरी-मार्च में फिरोजशाह कोटला में होनेवाला है जिसमें फिल्म और नाटक के कई बड़े अभिनेता-अभिनेत्री भाग लेनेवाले हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने 2010 में एक नाट्य विद्यालय खोलकर नई शुरु आत की है लेकिन औपचारिक रूप से इसे 2011 से ही शुरू होना है। देखना है कि इसका स्वरूप क्या होता है। मध्य प्रदेश में ‘नाचा’ और ‘माच’ जैसी कई स्थानीय नाट्य शैलियां रहीं हैं। सवाल है कि क्या नया नाट्य विद्यालय इन परंपराओं को अपने पाठ्यक्रम से लेकर मंचन तक में शामिल करेगा। जब बव कारंत भारत भवन रंगमंडल के प्रमुख बनकर गए थे तो उन्होंने बुंदेली में नाटक खेले थे। यह एक अभिनव कदम था जो बीच में ही बाधित हो गया। क्या मध्य प्रदेश का नया नाट्य विद्यालय उसे आगे बढ़ाएगा। इसका जवाब फिलहाल भविष्य के र्गभ में छिपा है। एक ओर यह नया नाट्य विद्यालय है तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की भारतेंदु नाट्य अकादमी भी है, जो हर दिन अपना असर और आकार खो रही है। क्या 2011 में भी इसका पराभव जारी रहेगा। मुश्किल यह है कि हमारी कई हिंदीभाषी राज्य सरकारें संस्कृति को लेकर बिल्कुल भी सचेत नहीं हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि नए साल में इस नाट्य संस्थान को सक्रिय बनाए। लखनऊ में रंगमंच की आलीशान परंपरा रही है। वहां आज भी ‘र्दपण’ जैसी गैर-पेशेवर रंगटोली है जिसने 2010 में अपने पचास साल पूरे होने पर कई दिनों तक चलनेवाला नाट्य समारोह आयोजित किया। लेकिन नए अभिनेताओं के प्रशिक्षण का काम प्रशिक्षण संस्थानों में ही हो सकता है और यही काम भारतेंदु नाट्य अकादमी नहीं कर रही है। जहां तक दूसरी गैर-पेशवेर मगर र्समपित रंग टोलियों का प्रश्न है, अरविद गौड़ के निर्देशन में ‘अस्मिता’ ने कई अच्छे नाटक किए। लुिशन दूबे भी काफी सक्रिय रहीं। लुशिन इस साल बच्चो के लिए अच्छे नाटक लेकर आ रही हैं। हिंदी रंगमंच में नई सोच और पहल की जरूरत है। बच्चों के लिए रंगमंच को लेकर समाज में उदासी सी है। कला और रंगमंच के क्षेत्र में 2011 के लिए एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि क्या बाल रंगमंच को नई ऊर्जा मिलेगी? मौलिक नाट्य लेखन के क्षेत्र में आया ठहराव क्या इस साल भी टूट पाएगा। यह भी बड़े चिंतन का प्रश्न है।
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