Sunday, January 16, 2011

नाटकों के राजनीतिक-सामाजिक निहितार्थ

तेरहवां भारत रंग महोत्सव अभी अपने शिखर पर है। इस महोत्सव का आधा हिस्सा लगभग बीत चुका है। इसलिए हम इसका अब तक का जायजा ले सकते हैं यानी अब तक इसमें क्या हुआ और कैसा हुआ? वैसे तो इस समारोह में शामिल कुल नाटकों की संख्या अस्सी है (पाकिस्तान से एक नाटक नहीं आया) और अब तक कई भाषाओं के अच्छे नाटक खेले जा चुके हैं। लेकिन इस सिलसिले में लातिन अमेरिकी रंगमंच की विशद चर्चा जरूरी है। यह पहला मौका है जब दिल्ली के दशर्कों को इतने लातिन अमेरिकी नाटक देखने को मिल रहे हैं। लातिन अमेरिकी नाटकों में सबसे ज्यादा प्रभावित किया है बोलिविया के एन उन सोल अमारिल्लोने, जो 1998 में वहां आए भूकंप पर केंद्रित है। उस भूकंप में भी बड़ी संख्या में लोग मरे और बड़े पैमाने पर विनाश और विस्थापन हुआ। नाटक इस प्राकृतिक आपदा के मानवीय और राजनैतिक पहलुओं को छूता है। इस आपदा के बाद अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बोलिविया सरकार की मदद की लेकिन वहा के नेताओं और नौकरशाहों ने आपदाग्रस्त लोगों पर समुचित ध्यान नहीं दिया। नतीजतन अवाम का संकट बढ़ता गया। एन उन सोल अमारिल्लो’, इस त्रासदी पर केंद्रित एक राजनीतिक नाटक है जिसमें हास्य-व्यंग्य भरपूर है। इसमें सिर्फ चार अभिनेता-अभिनेत्री कई तरह के चरित्रों को निभाते हैं। इसमें भरपूर शारीरिक भंगिमाएं भी है। अक्सर माना जाता है कि राजनीतिक नाटक मनोरंजक नहीं होते और एक सीमा के बाद बोर हो जाते हैं लेकिन यह नाटक इस धारणा को तोड़ता है। भारत में भी राजनीतिक नाटक करने वालों को इस नाटक से कुछ नई दृष्टियां मिल सकती हैं। भारतीय समाज में लातिन अमेरिकी उपन्यासों और कवियों की तो काफी चर्चा होती है लेकिन वहां के रंगमंच से हम अपरिचित से हैं। भारंगम में वहां से आए नाटकों से लातिन अमेरिकी रंगमंच का नया चेहरा सामने आता है। चिली का नाटक पुएता पेराल्ताउन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के एक लोकप्रिय कवि जुआन बौतिस्ता पेराल्ता और उसकी कविता पर आधारित है। पेराल्ता गरीब अशिक्षित और अंधे शख्स थे लेकिन मजदूरों के बीच सक्रिय थे। उनकी कविताओं ने चिली के उस ऐतिहासिक दौर में एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई थी। नाटक में पेराल्ता की कविताओं के मर्म को पुतलियों के सहारे उद्घाटित किया गया। प्रस्तुति में संगीत का पक्ष प्रबल था। पुतलियां (पपेट्स) कविता और राजनीति के मर्म को किस तरह सामने ला सकती है, इसका उदाहरण भी ये नाटक है। इस बार के भारंगम में अभी तक हिंदी के दो अच्छे नाटक आए। एक है पार्क’, जिसे मानव कौल और कुमद मिश्रा ने निर्देशित किया और दूसरा ड्रीम्स ऑफ तालीम’, जिसे सुनील शानबाग ने निर्देशित किया। हालांकि ड्रीम्स ऑफ तालीमहिंदी-अंग्रेजी का मिला जुला नाटक है। पार्कमुंबई के एक पार्क में घटित होता है, जिसमें में तीन बेंचें और तीन आदमी हैं। तीनों तीन बेंचों पर बैठ सकते हैं लेकिन समस्या है कि तीनों अपनी-अपनी पसंद की बेचों पर बैठना चाहते हैं। यहीं से तनाव शुरू होता है। हल्के- फुल्के ढंग से शुरू हुआ नाटक आगे गंभीर हो जाता है। बात सिर्फ पसंद के बेंच की नहीं रह जाती है बल्कि विस्थापन के मुद्दे और जमीन के अधिकार तक जाती है। नाटक में कई मुद्दे उठते हैं- इस्रयल पर किसका हक वाजिब है, यहूदियों का या फिलीस्तीनियों का, जंगल पर किसका अधिकार है आदिवासियों का या उनका जो राज्य के सहारे जंगल के संसाधनों पर अधिकार चाहते हैं? पार्ककई समकालीन सवालों से जोड़ता है। ड्रीम्स और तालीममुख्य रूप से वैकल्पिक यौनिकता (अल्टरनेटिव सेक्सुअलिटी) पर केंद्रित नाटक है। इसमें एक नाटक का रिहर्सल हो रहा है। यह नाटक ऐसे लड़के का एकालाप है जिसके अपने मित्र के साथ समलैंगिक संबंध हैं। नाटक समैलैंगितता और रंगमंच की समस्याओं पर कई मसले उठाता है। ड्रीम्स ऑफ तालीमरंगकर्मी चेतन दातार के प्रति एक श्रद्धांजलि हैं। चेतन दातर ने बहुत कम समय में भारतीय रंगमंच में अपनी जगह बनाई थी और उनका असमय निधन हो गया।

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