वर्धा के सेवाग्राम में स्थित बापू कुटी सादगी, स्थापत्य और उपयोगिता का एक अद्भुत नमूना है। यह एक तरह से गांधीवादियों का तीर्थ है। शायद ही कोई गांधीवादी हो जिसने बापू कुटी के दर्शन न किए हों। इसी छोटी-सी कुटी में रहते हुए महात्मा ने स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व किया था। यहां कांग्रेस कार्य समिति की अनेक बैठकें हुई और महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। यह कुटी इस बात का श्रेष्ठतम नमूना है कि कम पैसे में और स्थानीय साधनों का उपयोग करते हुए कितना सुंदर निवास बनाया जा सकता है। गांधीजी के निर्देश पर बनी इस कुटी की लागत 1931 में सिर्फ सौ रुपये आई थी। निर्माण के दौरान गांधीजी बराबर यहां नहीं रहते थे, लेकिन यात्रा करते हुए भी वे बार-बार यहां के लोगों को ताकीद करते रहते थे कि इसकी लागत सौ रुपये से ज्यादा न बढ़ने पाए। बाद में इसे बापू कुटी का नाम मिला। दिल्ली के गांधी म्यूजियम में तथा कई अन्य स्थानों पर बापू कुटी का प्रतिरूप बनाया गया है। बापू कुटी का प्रतिरूप बनाने का ताजा प्रस्ताव मुंबई के युसुफ अली सेंटर की ओर से आया है। यह प्रस्ताव इसलिए विचारणीय है कि इसकी लागत करीब 30 लाख रुपये आएगी। इस लागत में फर्नीचर, किताबों आदि का दाम शामिल है। यदि इन चीजों की कीमत दस लाख भी लगाई जाए तो सिर्फ निर्माण कार्य में 20 लाख रुपये खर्च होने की संभावना है। युसुफ मेहर अली भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के नायकों में एक शानदार व्यक्तित्व थे। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जब वह यरवदा जेल में नजरबंद थे तो उन्हें मुंबई का मेयर चुना गया। बाद में अपने कुछ साथियों के साथ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 1950 में उनके देहांत के बाद मुंबई में युसुफ मेहर अली सेंटर की स्थापना की गई। 1965 में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ने इसका उद्घाटन किया। तब से यह संस्था ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में काम कर रही है। जैव खेती में इसका काम उल्लेखनीय है। इस पृष्ठभूमि में यह पूछने का मन होता है कि युसुफ अली केंद्र को 30 लाख रुपये खर्च कर एक और गांधी कुटी बनाने की जरूरत क्यों आ पड़ी? यदि 1931 की तुलना में आज मूल्य वृद्धि को सौ गुना मानें तब गांधी कुटी बनाने का खर्च एक लाख रुपये आता है। इसके लिए 30 लाख रुपये खर्च की सोचना भी पाप जैसा लगता है। बहादुरी इसमें थी कि बापू कुटी के आदर्श का पालन करते हुए सस्ते से सस्ते में नई कुटी बनाई जाती। गांधीजी जीवन भर प्रयोग करते रहे। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में प्रयोग किए। बापू कुटी भी उनका एक ऐसा ही प्रयोग था। अगर इस प्रयोग को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार कर लिया जाता तो आज शहरों में बड़े-बड़े बहुमंजिला भवन न दिखाई देते और न ही अपार्टमेंट संस्कृति का विकास होता जिसकी लागत तो बहुत ज्यादा आती ही है साथ ही जिंदगी भी घुट कर रह जाती है। युसुफ मेहर अली सेंटर ने निर्णय किया है कि बापू कुटी के इस प्रतिरूप के रख-रखाव के लिए एक करोड़ रुपये के स्थायी कोष की जरूरत होगी। इतनी भारी रकम जमा करने के लिए चंदा देने की अपील की गई है। कहा गया है कि यह कुटी न केवन नागरिकों में कुछ विशेष मूल्यों की चेतना पैदा करेगी, बल्कि ग्लोबल वार्मिग के खतरों से अवगत कराएगी। इरादे नेक हैं, लेकिन इस कार्यक्रम के द्वारा अनावश्यक व्यय और फिजूलखर्ची की जिस संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसके बारे में क्या कहा जाए। वस्तुत: ग्लोबल वार्मिग की समस्या पैदा ही इसलिए हुई है कि पश्चिमी देशों में और उनकी नकल पर दुनिया के अन्य देशों में अनावश्यक उत्पादन तथा अनावश्यक उपभोग की संस्कृति का खतरनाक विस्तार हो रहा है। इसलिए मेहर अली सेंटर का कर्तव्य है कि वह अपने कार्यक्रमों में किफायत और सादगी को प्रमुख स्थान दे। अन्यथा वह अपने ही उद्देश्यों के विरुद्ध काम करता दिखाई देगा। स्वतंत्र भारत में गांधी के नाम पर बहुत से संस्थान बनाए गए हैं। बहुत से कार्यक्रम चलाए जाते हैं, लेकिन गांधी की परंपरा का विकास होता दिखाई नहीं देता। इस समय दो तरह के गांधीवादी दिखाई देते हैं। एक वर्ग उन गांधीवादियों का है जो गांधी की जीवन शैली का इस तरह अनुकरण कर रहे हैं मानो वे गांधी के समय में ही रह रहे हों। इनमें कुछ नियमित रूप से चरखा चलाने वाले हैं और ज्यादातर खादी से संबंधित संस्थाओं में काम कर रहे हैं। दरअसल खादी महात्माजी के लिए आर्थिक स्वावलंबन और रोजगार का मात्र एक प्रतीक थी। यदि रोजगार और आर्थिक स्वावलंबन की समग्र संस्कृति का विकास नहीं होता तो अकेले खादी से कुछ नहीं होने वाला है। आदमी खादी पहने और महंगा जीवन जिए तो यह खादी की भावना के विरुद्ध है। दूसरी किस्म के गांधीवादी वह हैं जो शांति-अहिंसा के नाम पर बड़ी-बड़ी संस्थाएं चलाते हैं। साल भर हवाई जहाज से यात्रा करते हैं और सुख-सुविधाओं की खोज में लगे रहते हैं। पहले प्रकार के गांधीवादी जड़ हैं तो दूसरे प्रकार के गांधीवादी एक अंतरराष्ट्रीय उद्योग में शामिल हैं। इस उद्योग में असली गांधी के लिए जगह कहां है एक समय में गांधी ने देश और विदेश में तूफान पैदा कर दिया था। अपनी अहिंसा के कारण नहीं, बल्कि अहिंसक प्रतिरोध के द्वारा। आज के गांधीवादी किसी प्रकार के प्रतिरोध के लिए नहीं जाने जाते।
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