Thursday, January 6, 2011

सांस्कृतिक विरासत समृद्ध करने की आस

संगीत और नृत्य जैसी प्र्रदशनकारी कलाओं के क्षेत्र में 2010 बहुत संपन्न र्वष रहा। व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकटों से भरे र्वष में यदि जनमानस को कहीं राहत और शांति मिली तो उस दुनिया में जहां नृत्य की थिरकती लय और संगीत के सुरों का वास है। संगीत और नृत्य के हर र्वष होने वाले आयोजन समारोह और उत्सव इस र्वष भी बड़े उत्साह से संपन्न हुए। सरकारों के संस्कृति विभागों, कला-संस्थानों, उद्योग-व्यापार क्षेत्र के घरानों, समुदायों और संगठनों के द्वारा प्रायोजित वे आयोजन, जो भारत की आजादी के बाद आए, वे सांस्कृतिक नव जागरण के दौर में एक के बाद एक आरंभ होते हुए नियमित परंपरा बनते गए। इनकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है, पर ये छोटे शहरों और कस्बों में नहीं, महानगरों में होते हैं इस समय कला संस्कृति के आयोजनों का सबसे बड़ा केन्द्र देश की राजधानी है। इनमें कुछ आयोजन किसी व्यक्ति या घटना की स्मृति से जुड़े हैं और ऐसे आयोजन भी जो संबंधित क्षेत्र को र्पयटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए आरंभ हुए हैं। स्वाधीन भारत में प्र्रदशनकारी कलाओं की विकास- यात्रा में निरंतर अपना योगदान अंकित करते और उनमें इस महादेश की बहुरंगी संस्कृति के रंग भरते इन नियमित आयोजनों के अलावा संगीत और नृत्य के क्षेत्र में और बहुत कुछ हुआ बीते र्वष में। साल के अन्त में संगीत की साधक और सेविका पदमा देवी मौदग्लय और ओडिसी नृत्य के श्रेष्ठ गुरु गंगाधर प्रधान के निधन से कला जगत को बड़ा धक्का लगा। दिल्ली में शास्त्रीय संगीत के महान प्रचारक और गंर्धव महाविद्यालय के संस्थापक पंडित विनय चन्द्र मौद्गल्य की पत्नी पद्मा देवी का भी एक बड़ा योगदान भाई जी यानी विनय चन्द्र के कार्यो को पूरा करने में रहा है। नृत्य साधना में अपना जीवन अर्पित कर ओडिसी के रस कलश को भरने वाले गंगाधर प्रधान का जाना नृत्य जगत की अपूरणीय क्षति माना गया। बीते साल के फरवरी के महीने में गंर्धव महाविद्यालय द्वारा आयोजित नृत्य के वाषिर्क उत्सव से रंगारंग शुरुआत हुई। उसके बाद फरवरी में ही कथक महोत्सव, छ: दशक से आयोजित होने वाला श्रीराम शंकर लाल संगीत सम्मेलन में संगीत की जानी-मानी हस्तियां शामिल हुई, मई के महीने में श्री राम भारतीय कला केन्द्र के कलाकारों के द्वारा बैले फेस्टिवल में नृत्य संरचनाओं की प्रस्तुति कलात्मक रंग लेकर सामने आई। हर साल की तरह गंर्धव महाविद्यालय और सरस्वती समाज का पंडित विष्णु दिगंबर संगीत सम्मेलन में मूर्धन्य और प्रतिभाशाली युवा कलाकारों की एक साथ मंच पर प्रस्तुति बहुत रोमांचक थी। उसके बाद कामनवेल्थ गेम्स के दौरान भारतीय संगीत और नृत्य का महाकुंभ राजधानी में देखने को मिला। सिरीकोर्ट कमानी, फिक्की से लेकर खेलगांव में आयोजित प्र्रदशनकारी कलाओं के आयोजन में संगीत और नृत्य के अनगिनत कलाकारों के कार्यक्रम हुए। हर साल की तरह हेबिटेट सेंटर, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और त्रिवेणी सभागार में भी पूरे साल संगीतनृत् य के कार्यक्रमों का सिलसिला चलता रहा। साल के आखिरी में नौ दिन तक आयोजित होने वाला दिल्ली इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल राजधानी में सबसे विराट और अनूठा समारोह था। दिल्ली के अनेकानेक सभागारों और खुले मंच पर आयोजित हुए इस उत्सव में देश और बाहर के 18 मुल्कों के तकरीबन 180 कलाकार शामिल हुए। इस आयोजन का उद्देश्य देश और विदेश की संस्कृति को एक दूसरे के नजदीक लाना और आपस में गले मिलकर बन्धुत्व भाव पैदा करना था। इस लिहाज से यह उत्सव एक बड़ी सीमा तक सफल रहा। सावन के महीने में मल्हार उत्सवों की झड़ी लगी तो अक्टूबर का महीने में पूरा माहौल रामलीला मय था। हमेशा की तरह ओपेरा की शक्ल में श्रीराम भारतीय कला केन्द्र की रामलीला र्दशकों को आकषिर्त करने में अग्रणी रही। इस र्वष एक प्रमुख आयोजन समय संगीत सम्मेलन था। हर साल संगीत नाटक अकादमी संगीत-नृत्य और नाटक के क्षेत्र में प्रतिभावान कलाकारों को अकादमी अवार्ड से सम्मानित करती है। कलाकारों के लिए इस अवार्ड का बहुत महत्व है। अवार्ड के बाद सम्मानित कलाकारों के कार्यक्रम होते हैं। पूरे देश से चुने गए इन कलाकारों की गायन-वादन और नृत्य प्रस्तुति हमेशा की तरफ काफी रोमांचकारी थी। लेकिन प्रायोजित संस्कृति के इस दौर में कला-संस्कृति को ग्लैमर से जोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसकी विसंगति यह है कि इसमें साधन हीन प्रतिभाशाली कलाकारों की अनदेखी की जा रही है और इसमें या तो मशहूर कलाकार होते हैं या जिनका ग्लैमर हो। यह दृश्य पिछले साल भी नजर आया। नृत्य और संगीत के क्षेत्र में 2011 में कौन से नए आयोजन होंगे। उनकी तस्वीर अभी ज्यादा साफ नहीं है क्योंकि पूरे साल के इन आयोजनों का कोई कलेंडर ही नहीं बना है। दिल्ली के प्रमुख आयोजनों की श्रृंखला में शंकर लाल संगीत सम्मेलन, कथक महोत्सव, विष्णु दिगंबर संगीत समारोह, मल्हार उत्सव आदि की दस्तक हर साल की तरह होगी। इस र्वष के नए आयोजनों में पंडित बिशन दास रिखी राम म्यूजिक फेस्टिवल और नृत्य का वाषिर्क महोत्सव प्रमुख है। ये दोनों आयोजन फरवरी के महीने में हो रहे हैं। मशहूर संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी द्वारा नवम्बर के महीने में वाद्यवृंद की अनूठी प्रस्तुति हो रही है। पचास कलाकार कश्मीरी रबाब, सारंगी, तुबंक नारी, मटका, दहर, वायलन, चेलों, बांसुरी, टेनर, तबला, डफ, ड्रम, गिटार आदि वाद्ययंत्रों के जरिए इस संगीत रचना को प्रस्तुत करेंगे। इसमें कश्मीर का वह लोक संगीत उजागर होगा जो अब तक कश्मीर की घाटी में ही सिमटा रहा है। इस विलक्षण वाद्य वृंद की रचना के पीछे संतूर वादक अभय रुस्तम सोपोरी की गहरी सूझ है। हर र्वष की तरह बाहर के मुल्कों के साथ कला-संस्कृति का आदान प्रदान करने के लिए बना भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद पूरे साल विदेशी कला-विधाओं के कार्यक्रम करेगी। कुल मिलाकर उम्मीद यही होनी चाहिए कि यह साल भी नृत्य और गायन के क्षेत्र में समृद्ध होगा।

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