इधर कुछ सालों में परंपरागत नृत्य संगीत आम लोगों में लोकप्रिय हुआ है और इन विधाओं की स्थिति थोड़ा उत्साहजनक दिखने लगी है। संगीत के मुकाबले नृत्य विधा के अनगिनत फलक हैं। नृत्य की शास्त्रीय समृद्धि के लिए कई कलाकारों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। कथक के पंडित बिरजू महाराज ने नृत्य में कई कालजयी रचनाएं रचीं हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि उनके नृत्य ने युवा पीढ़ी को बहुत प्रभावित किया। नतीजतन बड़ी तादाद में युवक-युवतियां नृत्य सीखने के लिए आगे आए। राजधानी के कथक केन्द्र में तो पंडित बिरजू महाराज की छतछ्राया में सीखने वालों की लंबी सूची है। उनमें से कई प्रतिभावान शिष्यों ने नृत्य गुरु के रूप में अपनी मौलिक पहचान बनाई है। उनमें एक नाम जयश्री आचार्य का है। जयश्री ने महाराज जी के अंदाज में अपने नृत्य को बखूबी संवारा है। देश-विदेश के मंचों पर नृत्य प्रदर्शन में दर्शकों से सराहना अर्जित करने के साथ जयश्री एक योग्य गुरु के रूप में भी जानी जाती हैं। लंदन के भारतीय विद्याभवन में एक गुरु की हैसियत से उन्होंने कई साल तक छात्रों को कथक की विधिवत शिक्षा प्रदान की। जयश्री का सपना था किअपने देश के बच्चों को कथक के परंपरागत संस्कार दिये जाएं ताकि वे भविष्य में शास्त्रीय नृत्य के संरक्षक बन सकें। उन्होंने अपने इस सपने को साकार किया है ‘अगिंकम’ के रूप में जहां वह नृत्य प्रदर्शन और व्याख्यान के जरिए बच्चों में नृत्य की अलख जगा रही हैं। जयश्री के सपने को पूरा करने में एक बड़ा योगदान उनके पति शिवशंकर राय का है जो खुद मशहूर तबला वादक हैं। जयश्री का मत है कि बच्चों को शास्त्रीय नृत्य सिखाना चुनौती भरा काम है, क्योंकि इस कला को सीखने के लिए बड़े धैर्य की जरूरत होती है। बच्चों में यह भावना पैदा करना आसान नहीं है। लेकिन मैं लगातार उनके मन में यह बात डालती रहती हूं कि संगीत-नृत्य अनंत अभ्यास का विषय है। मेरे इस कथन का कुछ असर भी हुआ और कई बच्चों ने नृत्य के लिए जीवन समर्पित करने का मन बना लिया। जयश्री का मानना है कि आज विखंडन के दौर में किसी परंपरा के संरक्षण की बात भले ही बेमानी लगती हो पर जीवन विकास के क्रम में विगत के महत्व को कभी नहीं नकारा जा सकता। नए दौर में रफ्तार है और इस किस्म की रफ्तार कि सब कुछ आकस्मिक ही है। ऐसे दौर में कला की पुरानी परंपराओं से बच्चों को कुछ मिलने की गुंजाइश भी कम रह गई है। ऐसा क्यों हो गया, यह विषय शोध-विचार का है। एक विडंबना यह भी है कि बच्चों को देश की समृद्ध कला संस्कृति और परंपराओं से अवगत करवाने और जोड़ने में एक सशक्त भूमिका इलेक्ट्रॉनिक मीडिया निभा सकता था पर वह इस विषय में उदासीन ही रहा है। लेकिन निजी स्तर पर कला से जुड़े कुछ लोग कला की पुरानी परंपराओं को बचाने में सजग दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में गुड़गांव के एपिक सेंटर में जयश्री ने अपने निर्देशन में बच्चों के नृत्य को प्रस्तुत किया। इनमें नन्हें बच्चों से लेकर युवा नृत्यांगनाएं शामिल थीं। देखने से लगा कि जिस मेहनत और लगन से जयश्री बच्चों को सिखा रही हैं उसी शिद्दत से वे सीख भी रहे हैं। नृत्य में उनका आत्मविश्वास और उत्साह देखने वाला था। कथक के आधार पर उनकी चालें, टुकड़े, थाट, जन सम्मोहिनी राग के सरगम पर लय के साथ नृत्य के बोलो की निकास आदि कैसे करनी चाहिए, इसे सिखाने में जयश्री का अच्छा प्रयास नजर आया। तीन ताल पर नाच में तिहाई से सम पर आने में भी बच्चे अच्छी कोशिश कर रहे थे। जयश्री की सीनियर शिष्याओं ने तीन ताल में निबद्ध राग भूपाली में रचना ‘हे गोविंद राखो शरण अब तो जीवन हारे’
पर पारंपरिक नृत्य और भक्तिभाव अभिव्यक्त करने की सुंदर चेष्टा की। सूरदास का भजन-मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो, तराना-परन आदि की प्रस्तुति भी सरस थी। अंत में जयश्री ने खास लखनवी अन्दाज में एकल नृत्य प्रस्तुत किया। महाराज बिंदादीन की राग देस में ठुमरी- ‘आवत श्याम चल मुकुट धर’ को तन्मयता से प्रस्तुत करने में उन्होंने विविध भाव दिखाए। इसी में गत निकास और गतभाव में गोपियों के साथ कृष्ण की छेड़छाड़ का भी मोहक दृश्य प्रस्तुत किया। यह पूरी प्रस्तुति तीनताल में निबद्ध थी। प्रस्तुति को गरिमा प्रदान करने में शिवशंकर राय का तबला वादन बहुत प्रभावी था। गायन में प्रतीप बनर्जी, सितार पर असित भट्टाचार्य और सारंगी पर अकरम की संगत असरदार थी।
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