समग्र भारतीय रंगमंच की बात करें तो कुछ नए मसले सामने आते हैं। पहला और सबसे बड़ा यह कि क्या भारतीय रंगमं च सिर्फ वाचिक या शब्द प्रधान होकर रह गया है?
हर साल भारत रंग महोत्सव की समाप्ति के बाद अनेक सवाल खड़े होते हैं। इनमें से कुछ सवाल नए होते हैं तो कुछ पुराने। इस साल भी ऐसे कुछ सवाल खड़े हुए। दिक्कत है कि ज्यादातर सवालों से जो मुद्दे खड़े होते हैं, वे अक्सर अनसुलझे रह जाते हैं और इस तरह से सवालों का एक पहाड़ खड़ा होता जाता है। जैसे पिछले कई सालों से यह मुद्दा उठ रहा है कि हिंदी का रंगमंच जहां का तहां खड़ा है और उसका सामाजिक आधार सिकुड़ रहा है। दिल्ली जैसे शहरों में जिस तरह अंग्रेजी रंगमंच फल-फूल रहा है और उसके दशर्क बढ़ रहे हैं, उसकी तुलना में हिंदी रंगमंच लगातार शिथिल हो रहा है। आज दिल्ली में गैर- पेशेवर सक्रिय रंगमंडलियां बहुत कम बची हैं। यही नहीं, दिल्ली के अलावा दूसरे हिंदी भाषी शहरों और राज्यों में भी हिंदी रंगमंच लुंजपुंज हालत में ही दिख रहा है। थोड़ी देर के लिए हिंदी रंगमंच की र्चचा छोड़ दें। क्योंकि यह चिंता का सनातन विषय है। इसके वृहद फलक के रूप में समग्र भारतीय रंगमंच की बात करें तो कुछ नए मसले सामने आते हैं। इनमें पहला और सबसे बड़ा मसला यह है कि क्या हमारा भारतीय रंगमंच सिर्फ वाचिक या शब्द प्रधान होकर रह गया है? चाहे हिंदी का हो या मराठी का या बंगाली-कन्नड़ का- भारतीय नाटकों का जोर ज्यादातर किस्सा-कहानी पर ही रहता है। हालांकि किस्सा-कहानी पर केंद्रित होना कोई गलत बात नहीं है लेकिन अगर सारा रंगकर्म एक ही तरह का हो जाए तो उसमें एकरसता भी आ जाती है और प्रयोगशीलता की संभावना सिकुड़ती जाती है। जिन लोगों ने भारत रंग महोत्सव में पोलैंड से आये नाटक ‘द साँग्स ऑफ यूरिपिडिज’ देखा होगा, वे समझ सकते हैं कि वाचिक के साथ-साथ आंगिक नाटकों में भी कितनी संभावना है। शब्द केंद्रित नाटक की अब एक सीमा शायद यह भी हो गई है कि वह अभिनेता को शारीरिक रूप से काफी शिथिल कर देता है। यही कारण है कि हमार नाटकों में आंगिक गौण हो जाता है और वाचिक प्रमुख। कभी अभिनेता को नट कहा जाता था। आज के भारतीय रंगमंच का अच्छा अभिनेता भी संवाद- अदायगी से आगे बहुत मुश्किल से जाता है। यह नहीं कहा जा सकता कि हमारे यहां शब्द केंद्रित नाटक के दायरे से बाहर निकलने की कोशिश नहीं हो रही है। खासकर नृत्य (आधुनिक नृत्य) के उपयोग से एक शारीरिक भाषा विकसित करने के अच्छे प्रयास हुए हैं लेकिन इन सारे प्रयासों के लिए कोई ठोस और सुसंगत पहल का अभाव दिखता है। खुद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय भी प्रयोगशील नाटकों पर कोई सार्थक शुरुआत नहीं कर सका है। क्या वह आगे इस बात को लेकर सोचेगा? इस साल भारगंम के पहले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में एशिया पैसेफिक नाट्य विद्यालयों का भी एक समारोह हुआ था जिसमें कई देशों के नाट्य- विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने शिरकत की थी। इस मौके पर कुछ छात्र प्रस्तुतियां भी हुई थी। इसमें ईरान से आई एक नाट्य प्रस्तुति ऐसी थी जिसमें सिर्फ एक अभिनेता था और उसने एक पुतली (पपेट) के सहारे जो एकल नाटक किया था वह अपने में बेहद रोमांचक था। हालांकि भारत में भी कठपुतलियों के खेल की लंबी परंपरा रही है लेकिन उसका आधुनिक रंगमंच से ज्यादा तालमेल नहीं हुआ है। इस भारंगम में भी अनुरूपा राय के निर्देशन में हुए नाटक एबाउट राम’ में पुतलियों का प्रयोग हुआ था लेकिन अभी हमें इस दिशा में बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। रंगमंच कई कलाओं का मिशण्रहै। भारतीय रंगमंच में मिशण्रका सिलसिला काफी थम गया है। कुछ नाटक भारंगम में क्यों आ जाते हैं, यह भी समझना मुश्किल है। जैसे इस बार मुंबई से आया नाटक कुंभकथा’ (निर्देशक त्रिशला पटेल) को ही लीजिए। यह मुंबई में होनेवाले कॉलेजियट ड्रामा सोसाइटी की प्रतियोगिताओं में पेश किए जानेवाले नाटकों की तरह था। यह न तो ठीक-ठीक व्यावसायिक किस्म का नाटक था और न प्रतिबद्ध। हालांकि इसमें धर्म का सहारा लिया गया था और समुद्र मंथन की पौराणिक कहानी में बेकार में ही इतना मसाला डाला गया कि बेस्वाद हो गया। लेकिन कुल मिलाकार यै बेहद निराशाजनक नाटक था। दरअसल यह अपने में एक पौराणिक नाटक लग रहा था।